NSA की कार्रवाई पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी- लगता है बुद्धि का प्रयोग नहीं किया गया

कोर्ट ने कहा कि जेल में बंद व्यक्ति पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की कार्रवाई करना निजी स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकारों के हनन करने जैसा है। ऐसा प्रतीत होता है कि रासुका लगाते समय बुद्धि का प्रयोग नहीं किया गया।

ग्वालियर, अतुल सक्सेना। एक दूध कारोबारी पर NSA यानि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई करना कलेक्टर को महंगा पड़ गया। दूध कारोबारी की याचिका पर हाईकोर्ट (High Court) ने ना सिर्फ NSA की कार्रवाई को निरस्त कर दिया बल्कि कलेक्टर और राज्य शासन पर जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने फटकार लगाते हुए टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि रासुका (NSA) लगाते समय बुद्धि का प्रयोग नहीं किया गया।

मामला मुरैना जिले के एक दूध कारोबारी का है। राज्य सरकार के निर्देश पर मिलावटखोरों पर की जा रही कार्रवाई के अंतर्गत मुरैना के दूध कारोबारी अवधेश शर्मा की दूध डेयरी पर मुरैना जिला प्रशासन ने 20 नवंबर को छापा मारा था। खाद्य विभाग की टीम को यहाँ रिफाइंड तेल, सप्रेटा दूध, कैमिकल, डिटरजेंट आदि मिला था। खाद्य विभाग की टीम ने डेयरी में मिले 700 लीटर दूध का सेम्पल लेकर नष्ट कर दिया था।

खाद्य विभाग ने दूध के सेम्पल बनाकर प्रयोगशाला भेज दिये और अपनी रिपोर्ट कलेक्टर को भेज दी। प्रशासन ने अवधेश को 1 दिसंबर को जेल भेज दिया। कलेक्टर ने सेम्पल की जांच रिपोर्ट आने से पहले ही खाद्य विभाग की रिपोर्ट के आधार पर अवधेश शर्मा पर 2 दिसंबर को रासुका यानि NSA लगा दी।

जेल में बंद अवधेश शर्मा ने रासुका की कार्रवाई को हाईकोर्ट (High Court) में चुनौती दी। हाईकोर्ट (High Court) ने फैसला सुनाते हुए रासुका (NSA) की कार्रवाई को निरस्त कर दिया। अवधेश शर्मा के एडवोकेट संजय बहिरानी ने एमपी ब्रेकिंग न्यूज़ को  बताया कि कोर्ट ने ये कहा कि मुरैना जिला प्रशासन द्वारा की गई रासुका (NSA) की कार्रवाई रासुका के प्रावधानों के विरुद्ध है। कोर्ट ने कहा कि जेल में बंद व्यक्ति पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की कार्रवाई करना निजी स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकारों के हनन करने जैसा है। ऐसा प्रतीत होता है कि रासुका लगाते समय बुद्धि का प्रयोग नहीं किया गया। कोर्ट ने कलेक्टर और शासन जो 30 दिन में 10,000 रुपये अर्थदंड के रूप में भरने के निर्देश दिये।

एडवोकेट संजय बहिरानी ने बताया कि कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 1 दिसंबर को व्यक्ति को जेल भेजा और 2 दिसंबर को रासुका लगाई गई जो अनुचित है। रासुका की धाराओं में प्रावधान है कि रासुका की कार्रवाई का आधार बताना होता है इसकी भी अनदेखी की गई। सबसे बड़ी बात ये कि रासुका की कार्रवाई की पुष्टि के लिये जिले से राज्य को और राज्य से केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाता है फिर केंद्र की स्वीकृति मिलने के बाद रासुका लगाई जाती है लेकिन इस प्रकरण में ऐसा नहीं किया गया।

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