कोरोना में अपना परिवार खो चुकी महिला ने पेश की मिसाल, बनी दूसरों के लिए उदाहरण

पति और बेटी को खो देने के बाद कृष्णा दास की मानो दुनिया ही उजड़ गई, इसके बाद कृष्णा कई दिन बेसुध सी रही,लेकिन फिर अचानक उन्हे एहसास हुआ की उनके जैसा दर्द नया जाने कितने परिवारों का और है ऐसे में उन्हे अब लोगों की मदद करनी चाहिए

जबलपुर, डेस्क रिपोर्ट। कोरोना ने पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले रखा है। पहली और दूसरी लहर ने तबाही मचाई और कई परिवारों को लील लिया, कोरोना ने ऐसा दर्द दिया कि परिवार खत्म हो गए और जो बचे वो जिंदा लाश की तरह बन गए, अब एक बार फिर तीसरी लहर ने लोगो को परेशानी में डाल दिया है, हालांकि कोरोना ने जो दर्द दिया कुछ फिर से संभल गए और कुछ उसकी कड़वी यादों को लेकर समाज सेवा में जुट गए ताकि अब कोई इससे पीड़ित हो तो कम से कम सब मिलकर इसका मुकाबला कर सके, जबलपुर में एक ऐसा ही परिवार है जो कोरोना की तपिश में खत्म हो गया बची तो सिर्फ एक महिला कृष्णा दास, इस महिला ने अपने पति और बेटी को खो दिया लेकिन इस दर्द के बाद के बावजूद उनके जख्मों ने 66 साल की कृष्णा दास का जिंदगी जीने का तरीका बदल दिया। कृष्णा के पति एसके दास (71) और इकलौती बेटी सुदेशना दास (36) को दूसरी लहर में खो चुकीं तिलहरी निवासी कृष्णा दास 16 लाख की एम्बुलेंस दान कर चर्चा में हैं।

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कृष्णा दास की तीन दिन के अंतराल में उनकी पूरी दुनिया लुट गई थी। पहले बेटी, फिर पति को खो दिया। खुद की जिंदगी बड़ी मुश्किल से बची। फैसला किया, अब वह औरों की मदद करेंगी। आज वह अपने इसी फैसले पर चल रही हैं।कृष्णा दास की एक ही बेटी थी,बेटी ने शादी नही की थी उसका सोचना था कि अगर शादी की तो माता पिता का ख्याल पूरे समय नही रख पाऊंगी। कृष्णा के पति एस के दास जीएसीएफ में JWM से रिटायर्ड पेंशनर थे। एसके दास 8 अप्रैल को बीमार पड़े। जांच में कोविड मिला। बड़ी मुश्किल से आशीष हॉस्पिटल में जगह मिल पाई थी। वही कृष्णा और उनकी बेटी बेबी की घर में पॉजिटिव रिपोर्ट आई। दोनो को किसी हॉस्पिटल में जगह नही मिली। तमाम कोशिशों के बाद जबलपुर के जिला चिकित्सालय में जगह मिली। लेकिन 12 अप्रैल को बेटी का कोरोना से निधन हो गया।

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बेटी मुंबई की कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी। कोविड की पहली लहर के बाद 30 सितंबर 2020 को घर आ गई थी। घर से ही ऑनलाइन जॉब कर रही थी। अस्पताल से भी दो दिन तक मोबाइल पर काम करती रही। बेटी की मौत के बाद कृष्णा उसका शव लेकर ग्वारीघाट पहुंची  बेटी को लेकर मैं अकेली ग्वारीघाट में बैठी रही। कोई नहीं था। कृष्णा रात में बेबी की लाश भी छोड़कर नहीं जा सकती थी। उसके शव से लिपटकर रोती रही। मेरे पति एसके दास के मित्र रुद्रनारायण बनर्जी आगे आए। वे पंडितजी को लेकर आए। रात में अंतिम संस्कार हुआ।

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बाद में पुणे में मौजूद रिश्ते के भतीजे दीपांकर अधिकारी ने जिस आशीष हॉस्पिटल में पति भर्ती थे, वहां एक बेड की व्यवस्था की और मुझे भर्ती कराया। लेकिन अफसोस की 15 अप्रैल को कृष्णा दास के पति एस के दास की भी कोरोना से ही मौत हो गई, पति और बेटी को खो देने के बाद कृष्णा दास की मानो दुनिया ही उजड़ गई, इसके बाद कृष्णा कई दिन बेसुध सी रही,लेकिन फिर अचानक उन्हे एहसास हुआ की उनके जैसा दर्द नया जाने कितने परिवारों का और है ऐसे में उन्हे अब लोगों की मदद करनी चाहिए और ऐसा काम करना चाहिए की जिस तरह की तकलीफ उन्होंने कोविड मे देखि आने वाले समय में कोई और नया देखे, अपने इस फैसले के बाद उन्होंने अपनी जमापूँजी को समाज सेवा में लगाने का निर्णय लिया और सबसे पहले 16 लाख की एम्बुलेंस खरीदकर दान दी, यह एम्बुलेंस कृष्णा दास ने मोक्ष संस्था को सौंपी, मोक्ष बेसहारा लोगों के लिए काम करने वाली जबलपुर की संस्था है, कोविड काल में इसी संस्था ने सबसे ज्यादा मरीजों के लिए काम किया था, कृष्णा ने एम्बुलेंस की चाबी मोक्ष के प्रमुख आशीष ठाकुर को सौंपी, कृष्णा की माने तो आगे भी वह इसी तरह से समाज सेवा के लिए समर्पित रहेगी और बजाए गम मनाने के लोगों की मदद कर उनके चेहरे पर मुस्कान लाएगी।