ऐतिहासिक शंखोद्धार महादेव मंदिर इस साल भी पानी की डूब में, नहीं होंगे दर्शन

मंदसौर, राकेश धनोतिया। शंखोद्धार महादेव इस वर्ष दर्शन नहीं देगें। साल 2012 के बाद 2018 -19 में उन्होने दर्शन दिए थे। लेकिन वर्तमान मे गांधीसागर बांध का जलस्तर 1291.50 है एवं मई माह का अंतिम सप्ताह चल रहा है और अभी बांध में बिजली निमार्ण भी नही चल रहा है। लगभग 1285 जलस्तर होने पर मंदिर में शंखोद्वार महादेव दर्शन होते है। लेकिन साढ़े छः फीट जलस्तर कम होना 21 जुलाई तक संभव नहीं लग रहा इसीलिए तब तक यहां दर्शन भी नहीं हो सकेंगे। बता दें कि ये महाभारत कालीन मन्दिर है और यहाँ परअकाल मृत्यु वालों का तर्पण होता है।

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ऐतिहासिक शंखोद्धार महादेव मंदिर इस साल भी पानी की डूब में, नहीं होंगे दर्शन

गांधी सागर जलाशय व चंबल नदी की गोद में स्थापित महाभारत कालीन प्राचीन मन्दिर शंखोद्वार महादेव मंदिर पिछले 3 सालों से पानी मे डूबा था, जो अब खाली हुआ है। जब बांध का पानी अपनी पूरी लेवल पर होता है तो मन्दिर पर करीब 5 फीट पानी रहता है जबकि जमीन से मन्दिर की ऊंचाई भी 20 फीट के करीब है। पिछले 2 साल से गांधी सागर बांध का पानी कम नहीं हो रहा था। परन्तु इस साल पानी लगातार घट रहा है लेकिन इतना भी कम नहीं होगा कि जिसके चलते ऐतिहासिक मन्दिर के दर्शन हो सके। बताया जाता है कि शंखोद्वार महादेव मंदिर में अकाल मृत्यु होने वाले मृत आत्माओं का तर्पण होता है ओर उनको मुक्ति मिलती है। जब भी यह मंदिर पानी से बाहर आता है देश के कोने कोने से लोग असमय काल की ग्रास बने अपने परिजनों के मोक्ष की कामना लेकर यहां आते हैं और विधि विधान से उनका पिंड दान करते है। मान्यतानुसार यहां महाभारत काल मे पांडवों ने अज्ञातवास बिताया था और उसी समय यहां पर भीम ने शंखासुर नामक राक्षस का वध किया था। तब शंखासुर ने पांडवों से वरदान मांगा था कि आपके साथ मुझे भी इतिहास में याद किया जाए जिसपर पांडवों ने यहां एक शिवलिंग की स्थापना की ओर उसका नाम शंखोद्वार रखा और उसको वरदान दिया था कि अकाल मौत मरने वाली आत्माओं को यहां के सिवा कही मोक्ष नही मिलेगा। इसका वर्णन महाभारत में भी आता है। बताया जाता है यह शिवलिंग 6 माह जमीन के अंदर और 6 माह जमीन से एक फीट बाहर रहते हैं जो साक्षात चमत्कार है।

अविभाजित मन्दसौर जिले में बांध बनने से पहले यहाँ गंगामाता शंखोद्वार महादेव के नाम से विशाल मेला लगता था जिसकी ख्याति दूर दूर तक थी। मगर आजादी के बाद 1950 में गांधीसागर बांध बनने के बाद हजारो गांव उजड़ गए और उसी के साथ यह स्थान भी इतिहास के पन्नो में गुम हो गया। तब से अब तक यहां जब जब भी यह मंदिर पानी से बाहर आता है तो कई भक्त दर्शन करने आते हैं। यहां रामपुरा के निकट दुधलई से देवरान,चचोर लोटवास होकर अपने वाहन से पहुँचा जा सकता है।