नवरात्रि 2021 : एक चमत्कारी मंदिर जहां माता के दर्शन से लकवा ग्रस्त रोगी हो जाते हैं ठीक

अनादिकाल से आद्य शक्ति के रूप में दुधाखेड़ी मां के मंदिर के महत्व मालवा, मेवाड़ और हाड़ोती अंचल के सुदूर गाँव में प्रतिष्ठित है।

मंदसौर, राकेश धनोतिया। देशभर में शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) का उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिले (Mandsaur district) के तहसील भानपुरा से गरोठ रोड पर 10 किलोमीटर दूर दुधाखेड़ी माता का एक भव्य मंदिर स्थित है जहां नवरात्रि पर्व पर विशेष पूजा अर्चना की जा रही है। वहीं मंदिर में मां के दर्शन करने के लिये लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। अनादिकाल से आद्य शक्ति के रूप में मां दुधाखेड़ी के मंदिर में देवी पंचमुखी रूप में विराजित हैं। यहां प्रतिमा के सामने अतिप्राचीन एक अखण्ड ज्योत प्रज्वलित है।

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नवरात्रि 2021 : एक चमत्कारी मंदिर जहां माता के दर्शन से लकवा ग्रस्त रोगी हो जाते हैं ठीक

दुधाखेड़ी माता जी का पहले प्राचीन मंदिर था जिसके स्थान पर भव्य नवीन मंदिर का निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहां नवरात्रों के शुभ अवसर पर अध्यात्मिक एवं धार्मिक उत्सवों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, जिसमें मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं पूरे देश से मां भगवती के असंख्य भक्तजन दर्शन के लिये पहुंचते हैं। दुधाखेड़ी माता भानपुरा से 12 कि.मी. दूर और गरोठ से 16 कि.मी. दूर स्थित है। नवरात्रि के समय दुधाखेड़ी माता के नौ रूप देखने को मिलते हैं। रोज नये रूप में माता अपने भक्तों को दर्शन देती हैं। मान्यता है कि माता की मूर्ति इतनी चमत्कारी है कि कोई भी भक्त उनसे आंख नहीं मिला पाता है। यहां पर जबसे मन्दिर बना है तब से एक अखण्ड ज्योत भी जल रही है।

यहां की मान्यता

इस मंदिर में 13 वीं सदी से निरंतर यहां पूजा-अर्चना का प्रमाण मिलता है। बताया जाता है कि मराठाकाल में लोकमाता अहिल्याबाई ने यहां धर्मशाला बनवाई थी। मां दुधाखेड़ी कोटा के मुहासिब आला, झाला जालिम सिंह की आराध्या देवी रही जिन्होंने यहां धर्मशाला बनवाई। इसके बाद ग्वालियर नरेश सिंधियां ने भी यहां धर्मशाला बनवाई थी। इस प्राचीन मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आते हैं। यहां ऐसी मान्यता है कि जो लोग लकवा बीमारी से पीड़ित होते है वे यहां आकर स्वास्थ्य का लाभ लेते हैं। माना जाता है कि माता के दरबार में शारीरिक विकलांग (लकवा) एवं मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट का निवारण होता है। यहां चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में मेला भी लगता है। यहां प्रबंध समिति की ओर से मुर्गा व बकरा चिन्ह अंकित चांदी के सिक्के श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध रहते हैं। धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से मालवा अंचल का यह बेजोड़ स्थल है।