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अनूठी प्रथा : यहां लगती है सांपों की अदालत, नाग की पेशी कर पूछते हैं काटने का कारण

Written by:Lalita Ahirwar
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अनूठी प्रथा : यहां लगती है सांपों की अदालत, नाग की पेशी कर पूछते हैं काटने का कारण

सीहोर, अनुराग शर्मा। आज का दौर भले ही आधुनिक हो गया हो, कुछ चीजों में लोगों की सोच भी बदल गई हो लेकिन लोगों में तमाम तरह की आस्था और विश्वास व अंधविश्वास आज भी देखा जाता है। हम बात कर रहे हैं सीहोर के ग्राम लसूडिय़ा परिहार में जहां आज भी सर्पदंश से पीडि़त लोग स्वस्थ होने के लिए मंदिर आते हैं। यहां सालों से नागों की अदालत लगती है, जहां पेशी पर नाग स्वयं मानव शरीर में आकर डसने का कारण बताते हैं। आप इनके इस विश्वास को आस्था कहें या अन्धविश्वास इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता है और ये आस्था या अंधविश्वास की प्रथा 100 वर्षों से चली आ रही है।

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दरअसल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सीहोर जिले से मात्र 15 किलोमीटर दूर, दीपावली के दूसरे दिन पड़वा को यह नजारा देखने को मिल रहा है। कई तो केवल इसी रहस्य को देखने गांव पहुंच रहे हैं। लसूडिय़ा परिहार में स्थित राम मंदिर में दीपावली के दूसरे दिन सांपों की अदालत लगाई गई है। इस अदालत में पिछले एक साल में सांप द्वारा काटे जाने के कारण को जानने के लिए आयोजन किया जाता है।

हनुमान की मडिय़ा के सामने लगी सांपों की पेशी के दौरान हजारों लोग यह जानने पहुंचे थे कि आखिर उन्हें सांप ने क्यों काटा। कारण जानने के लिए कांडी की धुन पर भरनी गाकर इन्हें पेशी पर बुलाया गया। इस दौरान पेशी पर पहुंचे सांपों ने शरीर में आकर काटने का कारण बताया। ग्राम के मन्नू गिरी जी महाराज ने बताया कि उनकी पिछली तीन पीड़ी से यहां होने वाली सांपों की पेशी करती आ रही है। दीपावली के दूसरे दिन प्रदेश भर से सांप के काटने से पीडि़त लोग यहां आते है और काटने का कारण जानते हैं। कारण जानने के साथ ही दोबारा एसी घटना न हो इसके लिए सांपों से वचन भी लिया जाता है।

कांडी-भरनी की धुन पर सांप की तरह लहराते हैं लोग

पिछले एक साल में सांप के काटने से पीडि़त लोग अपनी परेशानी लेकर मंदिर पहुंचते है। जहां काटे जाने का कारण जानने के लिए ढोल-मंजिरों और मटकी की धुन पर कांडी व भरनी गाई जाती है। जिसके कारण पीडि़त व्यक्ति सांप की तरह लहराने लगता है। यहां पेशी पर बुलाए गए सांप काटे जाने का कारण बताते है। कांड़ी-भरनी और विशेष मंत्र के साथ दोबारा पीडि़त को न काटे इसका संकल्प लिया जाता है।

आज के वैज्ञानिक युग में विज्ञान इस परंपरा को भले ही अंधविश्वास कह सकते हैं, पर लोगों की आस्था और विश्वास इस परंपरा को न सिर्फ जीवित रखे हुए है बल्कि इस परंपरा की बदौलत आज तक हजारों सर्पदंश से पीड़ित यहां से स्वस्थ हो चुके हैं।

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Lalita Ahirwar
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