नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख की यह मांग, लोकसभा अध्यक्ष का दिया हवाला

पत्र में उन्होंने विधानसभा का मानसून सत्र पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के बाद करने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने सत्र की बैठक कम से कम 20 दिन रखने की बात कही है।

भोपाल डेस्क रिपोर्ट। मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ गोविंद सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने विधानसभा का मानसून सत्र पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के बाद करने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने सत्र की बैठक कम से कम 20 दिन रखने की बात कही है।

नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर गोविंद सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखे पत्र में शुरुआत में लिखा है कि मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव नगरीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसलिए अब विधानसभा का मानसून सत्र इन चुनावों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही बुलाया जाना चाहिए। इसके साथ ही गोविंद सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि सत्र की बैठक कम से कम 20 दिन होनी चाहिए। लेकिन देखा यह गया है कि जब से बीजेपी की सरकार बनी है तब से सदन में बैठकों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। बैठकों की संख्या को लेकर डॉक्टर गोविंद सिंह ने वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की हिमाचल प्रदेश के पीठासीन सम्मेलन में दिए गए भाषण का भी हवाला दिया है जिसमें राज्य विधानमंडल की बैठकें वर्ष में 60 से 70 करने की सिफारिश की गई है।

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क्या लिखा है पत्र में

प्रति,
श्री शिवराज सिंह जी, चैहान,
माननीय मुख्यमंत्री,
म.प्र. शासन, भोपाल
विषयः- मध्यप्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र 2022 की तिथि पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने के बाद निर्धारित किये जाने एवं सत्र की बैठक कम से कम 20 दिवस रखने बावत्।
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महोदय,
प्रदेश में पंचायत चुनाव एवं नगरीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, पंचायत एवं नगरीय निकाय के चुनाव संपन्न होने के पश्चात् ही विधानसभा का सत्र बुलाने की तिथि निर्धारित करना उचित होगा एवं कम से कम 20 बैठक का सत्र बुलाया जाये जिससे प्रदेश की जन-समस्यायें एवं ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत चर्चा सदन में हो सकें।
माननीय, विधानसभा प्रजातंत्र का पवित्र मंदिर है एवं राज्य की संपूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें राज्य की जनता के हितों के ज्वलंत मुद्दे व सरकार की नाकामियों को उजागर करने, प्रदेश में जनहितैषी योजनाओं का क्रियान्वयन करने व भ्रष्ट्राचार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने के अवसर प्राप्त होते हैं, लेकिन प्रदेश में जबसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है तब से सदन की बैठकों में निरन्तर कमी होती जा रही है, जबकि संविधान में निहित भावनाओं के अनुरूप संविधान विशेषज्ञों ने समय≤ पर वर्ष में कम से कम 60 से 75 बैठकें प्रतिवर्ष आहूत करने की सिफारिशें की गई है।
माननीय, मैं आपको यह बताना उचित समझता हूं वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला जी ने हिमाचल प्रदेश के पीठासीन सम्मेलन में राज्य विधानमण्डल की बैठके वर्ष में 60 से 70 करने की सिफारिश की है। पूर्व लोक सभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी की अध्यक्षता में हुए विधानसभा अध्यक्षों के सम्मेलन में भी प्रतिवर्ष कम से कम 60 बैठकें प्रतिवर्ष आयोजित करने की सिफारिशें की थी। इसी तरह से वर्ष 2014 में 13-14 अक्टूबर 2014 को गोवा में आयोजित सोलहवें अखिल भारतीय सचेतक सम्मेलन में सर्व सम्मति से यह सिफारिश की गई थी कि छोटे राज्यों की विधानसभा में कम से कम 30 बैठकें, मध्यम और बड़े राज्यों में कम से कम 70 बैठकें प्रतिवर्ष होना चाहिए। किंतु मध्यप्रदेश में इन सिफारिशों का पालन नहीं किया जा रहा है अपितु लगातार सत्रों की बैठकों में कमी की जा रही है।
विधानसभा के माननीय सदस्य अपने क्षेत्र की जनसमस्याओं एवं प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों पर सदन में चर्चा न कराये जाने से उनके क्षेत्र की जन समस्याओं का निराकरण नहीं हो पाता है। मैं यहां यह भी उल्लेख करना चाहता हूं कि राज्य सरकार की यह मानसिकता हो गई है कि विधानसभा का सत्र केवल सरकारी कामकाज निपटाने के लिए सीमित बैठके बुलाई जाए।

नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख की यह मांग, लोकसभा अध्यक्ष का दिया हवाला

नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख की यह मांग, लोकसभा अध्यक्ष का दिया हवाला

विधानसभा के पटल पर जांच आयोग के प्रतिवेदन, लोकायुक्त के प्रतिवेदन, विश्वविद्यालय के प्रतिवेदन एवं अन्य प्रतिवेदनों पर विगत कई वर्षो से चर्चा नहीं कराई गई है। इसके अलावा विभिन्न घटनाओं की जांच हेतु गठित किए गए 07 न्यायिक जांच आयोगों की रिपोर्ट अभी तक विधानसभा के पटल पर नहीं आई है और न ही इन पर चर्चा की गई है। कुछ आयोगों द्वारा जांच प्रतिवेदन शासन को सौंपे जाने के बाबजूद भी नियमानुसार उन प्रतिवेदनों को विधानसभा के पटल पर जानबूझकर पटलित नहीं किया जा रहा है। उदाहरण के लिए बहुचर्चित इंदौर के पेंशन घोटाले की जांच रिपोर्ट दिनांक 15/09/2012 को शासन को सौंप दी गई है। उस जांच रिपोर्ट का परीक्षण करने के लिए मंत्रिपरिषद की उपसमिति के द्वारा भी परीक्षण किया जा चुका हैं उसके बाबजूद भी

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रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर नहीं रखे जाने से जांच आयोग का औचित्य ही समाप्त हो रहा है, राज्य शासन की इस कार्यप्रणाली को लेकर प्रदेश की आमजनता में शंकाऐं/कुशंकाएंें उत्पन्न हो रही है।
माननीय श्री दिग्विजय सिंह जी के शासनकाल में विधानसभा सत्र की अधिक से अधिक बैठकें होती थी एवं सत्र की अधिसूचना के पूर्व विपक्ष से चर्चा कर सत्र बुलाया जाता था, किंतु यह परंपरा समाप्त कर दी है एवं विपक्ष से सत्र बुलाने के लिए चर्चा तक नहीं की जा रही है, यह चिंतनीय है।
विगत माहों में प्रदेश में लगातार अनेक घटनायें घटित हुई है एवं सरकार की असफलतायें भी सामने आई है। प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह चैपट हो चुकी है। चारो ओर अशांति एवं अराजकता का वातावरण बना हुआ है, आये दिन चोरी, लूट, डकैती, अपरहण, हत्या, महिलाओं एवं अबोध बालिकाओं के साथ बलात्कार/सामूहिक बलात्कार एवं अपहरण तथा खरीद फरोख्त की घटनायें लगातार बढ़ती जा रही है। प्रदेश में बेरोजगारों की स्थिति विकराल हो रही है। विभिन्न शासकीय विभागों में बड़ी संख्या में अधिकारियों/कर्मचारियों के पद रिक्त है परंतु सरकार द्वारा रिक्त पदों की पूर्ति नहीं की जा रही है। प्रदेश में वन माफिया हावी है जो धड़ल्ले से वनों की अवैध कटाई में संलग्न है, जिससे वन क्षेत्र का रकबा घट रहा है, प्रदेश में विद्युत संकट गहरा गया है, नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्र में विद्युत कटौती की जा रही है। विद्युत उपभोक्ताओं को बिजली के भारी भरकम बिल देकर अवैध वसूली की जा रही है। प्रदेश में भू-माफिया के नाम पर वैध मकानों पर बुलडोजर चलाकर तोड़ा जा रहा है।
प्रदेश के किसान आत्महत्या कर रहे है एवं खाद-बीज के लिए भटक रहे तथा महंगे व नकली अमानक खाद खरीदने को मजबूर है। प्रदेश में खनिज माफिया द्वारा रेत व अन्य खनिजों का राज्य सरकार के संरक्षण में अवैध उत्खनन किया जा रहा है, जिससे शासन को करोड़ों रूपयों की हानि हो रही है। पेट्रोल, डीजल एवं रसोई गैसों की अत्यधिक कीमतें बढ़ायें जाने के बाद नाम मात्र की कीमत घटाने से आम जनता को विशेष राहत नहीं मिल रही है, जिससे महंगाई चरम सीमा पर है। प्रदेश में मध्यान्ह भोजन एवं पोषण आहार वितरण पर बड़े स्तर पर आर्थिक अनियमिताएं हो रही है एवं प्रदेश के आंगनबाड़ी केन्द्र बदहाल स्थिति में पहुंच गये है, वहीं लाॅकडाउन अवधि मे बंद स्कूलों में छात्र-छात्राओं को स्कूल ड्रेस, साइकिल, छात्रवृति वितरण में भी घोटाला सामने आया है। राज्य सरकार विकास के नाम पर कर्ज पर कर्ज लेती जा रही है, इस कर्ज की राशि से विकास करने के बजाय अपने प्रचार प्रसार में व्यय कर आम जनता को कर्ज के बोझ तले दबा रही है।
प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्थायें पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। आम जनता को मजबूर होकर निजी अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर होना पड़ रहा है। आयुष्मान योजना भी घोटाले की भेंट चढ़ चुकी है। प्रदेश में ओला-पाला से किसानों की फसलें चैपट हो गई है किसानों को क्षतिपूर्ति मुआवजा के वितरण में भिंड जिले सहित समूचे प्रदेश में लगभग 800 करोड़ रूपये का अनियमितता एवं भ्रष्टाचार का मामला उजागर हुआ है। माननीय मुख्यमंत्री जी लगातार घोषणा पर घोषणा करते आ रहे है, कोरोनाकाल में की गई घोषणाओं का आज तक क्रियान्वयन नहीं हुआ है। इसके बाद भी उनके द्वारा लगातार महत्वपूर्ण घोषणायें की जाती है, बाद में वहीं घोषणा जुमला साबित हो रही है, यह लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं है। इसी तरह से पंचदश विधानसभा के विभिन्न सत्रों में माननीय सदस्यों द्वारा लगाये गये लगभग 400 प्रश्नों के मार्च 2022 तक उत्तर नहीं दिये गये है। यह भी चिंतनीय है। जनजाति मद की राशि इस वर्ग के विकास पर ही व्यय किया जाना चाहिए किंतु जनजाति समाज का विकास करने की बजाय यह राशि उनके नाम पर प्रचार, प्रसार एवं सम्मेलन पर व्यय की जाकर जनजाति वर्ग को विकास सेे वंचित किया जा रहा है। ऐसे महत्वपूर्ण ज्वलंत मुद्दे है, जिस पर विधानसभा में चर्चा किया जाना आवश्यक है।
अतः आपसे अनुरोध है कि उपरोक्त वर्णित स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए मानसून सत्र की तिथि पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव संपन्न होने के बाद निर्धारित की जाये एवं सत्रावधि की बैठकें कम से कम 20 दिवस रखी जाये।
आशा है कि आप मेरे सुझाव से सहमत होगे।
सादर।