बुंदेलखंड: मजदूरों को सता रही पेट पालने की चिंता, पलायन को मजबूर

ओरछा,टीकमगढ।मयंक दुबे।

बुन्देलखण्ड का पलायन कोई नई बात नही है। कभी जिंदगी से कभी जगह से लेकिन अब यह पलायन उन जगहों से हो रहा है, जो जिंदगी जीने के जज़्बे को जिंदा रखे थे। क्योंकि वहाँ के पलायन ने उन्हें दो जून की रोटी थी। इन सबके बीच अब यहाँ का मज़दूर कोरोना की वजह से पलायन कर रहा है। यह पलायन अब ट्रेनों बसों से नही सड़को पर पसरे सन्नाटे के बीच हो रहा है। मीलो पैदल चलकर मज़दूर कोई दिल्ली,एरच, आगरा से आ रहे है।

जिंदगी जीने की चाह में इन्होंने पलायन किया था, अपने घर से अपनी सरजमीं से लेकिन कोरोना ने ऐसा कहर बरपा या की पैरो में छाले पड़ गए मगर अब भी पैदल चलना है। इन सबके बीच इनकी सबसे बड़ी चिंता इस बात की घर पहुँचकर दो जून की रोटी की व्यवस्था कैसे होगी क्योंकि सरकारी घोषणाएँ काफी होती तो पहले ही पलायन को मजबूर क्यो होते। ग़ौरतलब है कि बुन्देलखण्ड पलायन का मुख्य कारण सूखा और प्राचीन जल स्त्रोतों के संरक्षण के अभाव के बीच पानी का गिराता जल स्तर था।

मध्य प्रदेश उत्तरप्रदेश के अलग-अलग जिलों वाले बुंदेलखंड का केंद्र झांसी रेलवे स्टेशन बुंदेलखंड के पलायन की कहानी रोज़ाना बयां करता था। लेकिन कोरोना के कहर से बस ट्रेन सब ठप हो गया अगर कुछ ठप नही हुआ तो वह पलायन। कोरोना कहर के बीच बुन्देलखण्ड की सड़को का पलायन जारी है। रोज़ाना हजारों मज़दूर अपने घर के लिए सड़को से वापिस आ रहे है। लॉकडाउन के बीच भी यहाँ की सड़कों पर अपने नानिहालो के साथ इन मज़दूरों का पलायन जारी है।

काम की तलाश मजदूरी करने वाले बुंदेलखंड के हजारों लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन कर दो जून की रोटी जुगाड़ में इधर उधर भटकते थे कोरोना महामारी के चलते अब यह अपने घरों में वापिस आ रहे है। बुन्देलखण्ड के पलायन के मुख्य कारण पिछले कई सालों से सूखे का दंश रहा है कभी मौसम की मार की वजह से बुन्देलखण्ड के हालात बद से बदतर होते रहे हैं। तो कभी सूखे की वजह से आत्महत्याओं के साथ ही, बड़ी संख्या में किसान यहाँ से पलायन करते रहे है ।

पहले सूखे की इस भयानक त्रासदी से अपने और परिवार को बचाने के लिये इस इलाके से तकरीबन 62 लाख से ज्यादा किसान, मज़दूर पलायन कर चुके थे। लेकिन कोरोनो महामारी ने अब इन्हें एक बार फिर सड़को पर ला दिया है, क्योंकि यह लॉकडाउन के बाद घर वापसी कर रहे है। लेकिन अब इनके लिए समस्या और बड़ी है क्योंकि एक तरफ संक्रमण का ख़तरा है तो वही दूसरी और दो जून की रोटी की तलाश में भागे लोगो के सामने अब परिवार चलाने का संकट है ऐसे में जब सरकार द्वारा दिए गए पुराने पैकेज जब इन्हें ना काफी साबित हुए और इन्हें घर छोड़कर जाना पड़ा था तो नए ऐलानों में के बीच घर पहुँचने के बाद इनके परिवारों की क्या स्थिति होगी यह भविष्य के गर्त में छुपा है क्योंकि अगर सरकारों ने अब इनकी ओर ध्यान न दिया तो हो सकता है कोरोना के संक्रमण से यह बच जाए लेकिन पेट की प्यास इन्हें जीने नही देगी ।

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