यहां भाजपा प्रत्याशी की हालत खराब, मुख्यमंत्री को संभालना पड़ा मोर्चा

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जिले की सबसे चर्चित सीट जावद में पूरे प्रदेश की नजर है। भाजपा प्रत्याशी की कमजोर स्थिति को देखेते हुए मुख्यमंत्री शिवराजसिंह को मोर्चा संभालना पड़ रहा है। वहीं कांग्रेस के लिए बागी उम्मीदवार ने मुश्किलें खड़ी कर दी। हालांकि कांग्रेस-भाजपा अपनी-अपनी जीत के प्रति आश्वस्त  दिखाई्र दे रही है।

नीमच। श्याम जाटव।

कांग्रेस के लिए जावद विधानसभा सीट प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी हैं और यहां से पीसीसी चीफ कमलनाथ की साख पर दांव पर हैं। नाथ ने अपने समर्थक राजकुमार अहीर को टिकट दिलाया हैं। अहीर तीसरी बार मैदान में है और वे दो चुनाव हारने के बाद भी लोगों से जीवंत संपर्क हुए है और इसी आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं।

कांग्रेस प्रत्याशी का हाल

प्लस पाइंट-चुनाव में पराजय का मुंह देखने के बाद भी क्षेत्र में सक्रिय रहे। 2008 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े भाजपा प्रत्याशी ओमप्रकाश सखलेचा से महज 4771 वोट से हारे। 2013 में टिकट नहींं मिलने पर निर्दलीय मैदान में थे। इस चुनाव में हार का आंकड़ा 13651 रहा।   यानि क्षेत्र में लोकप्रियता का लाभ मिला। आम खास में लोकप्रिय और किसान वर्ग में सहानुभूति की लहर।

माइनस पाइंट-कांग्रेस से बगातव करना और दो चुनाव लगातार हारना। अभी 2018 में कांग्रेस के बागी व इंदौर के कारोबारी समंदर पटेल का चुनाव लडऩे से नुकसान की संभावना है। कांग्रेस की गुटबाजी और बाहरी उम्मीदवार का तमगा। जावद नगर में एक बडे वर्ग की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

चुनौती-इस विधानसभा चुनाव में पूरा राजनीतिक कॅरियर दांव पर लगा हुआ है। स्थिति यह है इस बार करो या मरो जैसी हालत है। इस चुनाव में पूरा दमखम लगाना। साथ ही भितरघात के खतरे से सामना करना ही सबसे बड़ी चुनौती हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं में केवल कमलनाथ के अलावा दूसरे नेताओं  जैसे चुनाव अभियान समिति अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया व दिग्विजयसिंह और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन से बेहतर तालमेल का अभाव।

भाजपा प्रत्याशी का हाल

प्लस पाइंट-पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरेंद्र कुमार सखलेचा के बेटे व लगातार तीन चुनाव में भाजपा से विधायक। चौथी बार मैदान में है। 2003 में कांग्रेस के पूर्व मंत्री घनश्याम पाटीदार को हराया। 2008 में 42373 वोट प्राप्त किए और वोट प्रतिशत 41.29 रहा। 2013 में 44.62 वोट हासिल किए और कांग्रेस के राजकुमार अहीर को पटखनी दी।

माइनस पाइंट-क्षेत्र में धाकड़ समाज का विरोध और लगातार तीन बार से विधायक रहने से पार्टी का एक धड़ा नाराज। साथ ही जनपद अध्यक्ष प्रतिनिधि पूरन अहीर से अदावत भारी पड़ सकती है और सबसे ज्यादा अपने ही दल के लोगों की नाराजगी। क्षेत्र में अपने समकक्ष किसी नेता को खड़े नहीं होने दिया।  तीन बार विधायक होने के बावजूद मंत्र्रीमंडल में शामिल नहीं किया।

चुनौती-कांग्रेस के बागी पटेल के मैदान में होने से धाकड़ समाज का वोट नहीं मिलना भारी चुनौती है। पटेल के चुनाव लडऩे से मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार है। दूसरी तरफ 15 साल की एंटी इनकंबेंसी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी नुकसान दे सकती है।