इन जिलों में ये मुद्दा डुबा सकता है भाजपा की लुटिया, लोगों में गुस्सा

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भोपाल। मध्यप्रदेश के विंध्य, महाकौशल और बुंदेलखंड के कुछ इलाको में भाजपा को इस बार भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। विधानसभा चुनाव में इस बार इन अंचलों के कई जिलों में स्थानीय लोगों में सरकार की मनमानी से गुस्सा है। यह गुस्सा सरकार के खिलाफ भूमि अधिग्रहण को लोकर है। अकेले छिंदवाड़ा में करीब 25 हजार आदिवासियों उनके हक से वंचित हैं। सरकार द्वारा बताया गया हर्जाना उनको अभी तक नहीं मिला है। सरकार ने भूमि का अधिग्रहण करने के बदले में आदिवासियों को रोजगार के सुनहरे सपने दिखाए थे। लेकिन भूमि लेने के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ और आज भी यह आदिवासी अपने हक की लड़ाई लड रहे हैं। 

बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक छिंदवाड़ा के किसान सुनील कड़वे  की 200 एकड़ उर्वर भूमि का अधिग्रहण छिंदवाड़ा जिले के सौसर स्थित सतनूर में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के लिए किया गया है।वर्ष 2007 में मध्य प्रदेश सरकार ने यह जमीन आवंटित की थी। सरकार ने करीब 500 परिवारों के 25,000 आदिवासियों को आश्वस्त किया था कि उन्हें न केवल रोजगार प्रदान किया जाएगा बल्कि इस जमीन के बदले पर्याप्त मुआवजा राशि भी दी जाएगी।  वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के मुताबिक किसानों से अधिग्रहीत की गई जमीन को अगर उल्लिखित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है तो उसे किसानों को लौटाना होगा। मध्य प्रदेश सरकार और छिंदवाड़ा प्लस प्राइवेट लिमिटेड के बीच समझौते को 10 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन मामला जस का तस है।

सरकार पर कारोबारियों का फायदा पहुंचाने का आरोप

आदिवासियों का आरोप है कि सरकार ने जो वादे किए उन्हें आज तक पूरा नहीं किया। कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार ने ओनेपोने दामों पर भूमि का अधिग्रहण किया और किसानों को आज तक उनसा सही हर्जाना नहीं मिला। अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव बादल सरोज कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने पूरे प्रदेश में जमीन की लूट मचाई है। उसे औनेपौने दाम में कारोबारियों को दे दिया गया। वह कहते हैं कि जनजातीय इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे खनिज संसाधनों से भरपूर हैं और बड़ी संख्या में लोग आज भी अपने अधिकारों को लेकर जानकार नहीं हैं। जहां सरकारी अधिकारियों को अधिग्रहण में मुश्किल आती है वहां कॉर्पोरेट घराने निजी स्तर पर जमीन की खरीद शुरू कर देते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में जमीन की खरीद-बिक्री करना संभव नहीं है लेकिन जिलाधिकारियों के विशेष अधिकार की सहायता से यह संभव किया जा रहा है। उनके मुताबिक किसान और आदिवासियों में सरकार को लेकर गहरा असंतोष है। विंध्य प्रदेश, चंबल क्षेत्र और राज्य के अन्य हिस्सों में भूमि अधिग्रहण चिंता का विषय बन गया है।