पुरानी पेंशन योजना पर अपडेट, सीएम का बड़ा बयान, महासंघ की नई तैयारी, क्या मिलेगा लाभ?

2002 तक देश व प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले हर एक कर्मचारी को पेंशन मिलती थी, लेकिन 2002 के बाद पुरानी पेंशन योजना को बंद कर दिया गया।

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शिमला, डेस्क रिपोर्ट।हिमाचल प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पुरानी पेंशन योजना बहाली की मांग दिनों दिन तेज होती जा रही है। वही कांग्रेस के घोषणा पत्र में ओल्ड पेंशन योजना( OPS)को लागू के वादे ने सियासी गलियारों मे भी हलचल तेज कर रखी है। एनपीएस कर्मचारी लगातार ओल्ड पेंशन ( old pension) की मांग को लेकर प्रदेश भर में क्रमिक अनशन पर बैठे हुए हैं।इसी कड़ी में आज 13 सितंबर को भी हड़ताल जारी रही है और कर्मचारियों ने 15 सितंबर से वोट फ़ॉर OPS अभियान चलाने का फैसला किया है।

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NPS कर्मचारी महासंघ ने पेंशन की बहाली के लिए 15 सितंबर से वोट फॉर OPS अभियान चलाने का फैसला लिया है। यदि सरकार उनकी मांगें नहीं मानती है तो इसके अलावा अन्य कार्यक्रम भी चलाए जा सकते हैं। कर्मचारियों ने सरकार को चुनावों से पूर्व उनकी मांग पूरी ना होने पर आगामी चुनाव में खामियाजा भुगतने की चेतावनी दे दी है और कहा है कि जब तक सरकार उनकी मांगों को नहीं मानती है तब तक क्रमिक अनशन जारी रहेगा।

बता दे कि 2002 तक देश व प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले हर एक कर्मचारी को पेंशन मिलती थी, लेकिन 2002 के बाद पुरानी पेंशन योजना को बंद कर दिया गया, ऐसे में हिमाचल प्रदेश में फिर पुरानी पेंशन दोबारा लागू करने की मांग कर रहे है, लेकिन अबतक सरकार की तरफ से कोई भी आश्वासन नहीं मिला है, लेकिन कांग्रेस (Congress) ने राज्य में सरकार बनने पर 10 गारंटी वाले अपने मिनी चुनावी घोषणा पत्र में पुरानी पेंशन योजना (Old Pension Scheme) बहाली का ऐलान कर सियासी पारा हाई कर दिया है।

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वही सोमवार को मीडिया से चर्चा करते हुए सीएम जयराम ठाकुर ने कहा कि ओपीएस को पुनर्जीवित करने की कर्मचारियों की मांग एक ज्वलंत मुद्दा है और सरकार इसके प्रभावों का अध्ययन कर रही है।अगर कांग्रेस ओपीएस के पक्ष में है, तो योजना को क्यों रोक दिया गया जब उनकी ही पार्टी सत्ता में थी और कांग्रेस ने 2013 से 2017 तक अपने कार्यकाल के दौरान इस योजना को पुनर्जीवित करने से क्या रोका। ओपीएस कांग्रेस शासित राज्यों छत्तीसगढ़ और राजस्थान में थी, लेकिन हाल ही में दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक के दौरान दोनों मुख्यमंत्रियों ने स्वीकार किया था कि वे इस योजना को सही मायने में लागू करने में सक्षम नहीं हैं।