Gyanvapi Masjid Case : वाराणसी कोर्ट में सुनवाई पूरी फैसला सुरक्षित, सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका

वाराणसी जिला अदालत ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

नई दिल्ली, डेस्क रिपोर्ट। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ज्ञानवापी मस्जिद केस (Gyanvapi Masjid Case) वाराणसी जिला अदालत को ट्रांसफर किये जाने के बाद आज उसपर सुनवाई हुई। जिला अदालत ने 45 मिनट में सुनवाई (Hearing of Gyanvapi Masjid case in Varanasi District Court) पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया।  इस बीच भाजपा नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट  में एक अर्जी लगाकर उन्हें इस मामले में पक्षकार बनाने की मांग की है याचिका में उन्होंने कहा है कि 1991 में बना प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट मस्जिदों पर लागू नहीं होता।

वाराणसी जिला अदालत (Varanasi District Court) में सुनवाई हुई। कोर्ट रूम में भीड़ को जाने से रोका गया, केवल 23 लोगों को हो कोर्ट रूम में जाने की इजाजत है, पूर्व कोर्ट कमिश्नर अजय मिश्रा को भी कोर्ट में जाने से रोका गया। क्योंकि कोर्ट रूम में जाने वाले लोगों की लिस्ट में अजय मिश्रा का नाम नहीं था। 23 लोगों में चार याचिकाकर्ता और उनके 19 वकील मौजूद थे।

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मामले की सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजय कृष्णा विश्वेश ने की उन्होंने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। जिला जज ने 45 मिनट में सुनवाई पूरी कर ली। फैसला कल मंगलवार को सुनाया जायेगा।

अदालत में मुस्लिम पक्ष के वकील अभय नाथ यादव ने दीन मोहम्मद के 1936 के केस का हवाला दिया है। हिन्दू पक्ष की तरफ से सीनियर एडवोकेट मदन बहादुर सिंह और उनके साथ एडवोकेट हरिशंकर जैन और एड़वोकेर विष्णु शंकर जैन पेश हुए।  उन्होंने सर्वे के आधार पर अपनी दलील रखीं ।

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इस बीच भाजपा नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका लगाकर (New petition in Supreme Court regarding Gyanvapi Masjid case) उन्हें इस मामले में पक्षकार बनाने की मांग की है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि 1991 प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट मस्जिदों पर लागू नहीं होता।

याचिका में एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है। सदियों से वहां भगवान आदि विश्वेश्वर की पूजा होती रही है। अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि मंदिर पूजा का स्थान है क्योंकि देवता वहां निवास करते हैं। इसलिए मंदिर हमेशा मंदिर ही रहता है और उसके धार्मिक चरित्र को कभी बदला नहीं जा सकता। अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि इससे मंदिर का धार्मिक स्वरूप नहीं बदलता है। ऐसा तभी हो सकता है, जहां मंदिर में स्थापित मूर्तियों को विसर्जन की प्रक्रिया के तहत वहां से शिफ्ट न किया जाए।

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वहीं मस्जिद सिर्फ प्रार्थना का एक स्थान होती है। इसलिए खाड़ी देशों में उसे स्थानांतरित कर दिया जाता है या उसे तोड़ा भी जा सकता है। अकसर वहां सड़क, स्कूल, अस्पताल या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान के लिए ऐसा करने की जरूरत होती है तो किया जाता है। उन्होंने कहा कि मस्जिद और मंदिर का धार्मिक चरित्र पूरी तरह अलग होता है। ऐसे में 1991 का एक्ट  मस्जिद पर लागू नहीं होता।

उन्होंने अपनी याचिका में यह भी दलील दी है कि इस्लामिक सिद्धांतों के मुताबिक भी मन्दिर तोड़कर बनाई गई कोई इमारत मस्जिद नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि 1991 का प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट किसी धार्मिक स्थल के स्वरूप को निर्धारित करने से नहीं रोकता। उन्होंने अपनी याचिका में मस्जिद कमेटी की याचिका को खारिज करने की मांग की है, जिसे ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे के खिलाफ दायर किया गया है।