कोठियों से दूर हुआ अनाज तो कुपोषित हो रहे आदिवासी 

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— टीबी जैसी बीमारियों से ग्रसित हो रहे छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासी।

रायपुर।श्वेता शुक्ला। प्राचीन आदिम जनजाति बैगा के पास भोजन की गारंटी के लिये अनोखे तरीके हुआ करते थे। बैगा जनजाति के अलावा अन्य जनजातियों के पास भोजन की गारंटी के लिये अनाज कोठियां की परंपरा चली आ रही है और पारंपरिक तौर पर हर घर में कोठियां अनाज भरने के लिये ही बनाई जाती रही हैं। रही वर्तमान समय में इन इन काठियों का प्रचलन खत्म सा हो गया है लिहाजा आदिवासी आज कुपोषित होकर टीबी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं। क्योंकि कुपोषण टीबी होने का प्रमुख कारण है।

प्राचीन समय से ही जनजातियां भोजन की गारंटी के लिये अपने घरों में कोठियों का निर्माण किया करती हैं लेकिन आधुनिक व बदली खेती की पद्धति ने बैगाओं की अनाज कोठियों के पेट खाली कर दिये हैं जिन घरों में कोठियां हैं उनमें अनाज कम दिखाई देता है अधिकांश कोठियों में घर की अन्य सामग्रियां भर दी जाती हैं जिन कोठियों में पहले पारंपरिक खेती के दौर में अनाज लबालब भरा रहता था वहीं आधुनिक खेती ने कोठियों को दाने दाने को मोहताज कर दिया है। कोठियां खाली हुई तो बैगा की सेहत पर सीधा असर दिखाई देने लगा और हमेषा स्वस्थ रहने वाले बैगा अब बीमार व कुपोषित कहलाने लगे।

जनजातीय समाज में अनाज कोठियां संपन्नता का प्रतीक मानी जाती थी और यही कोठियां उन्हें खाद्य असुरक्षा के भय से मुक्त रखती थीं इन कोठियों में इतना अनाज होता था कि साल भर इसमें उनका गुजारा आसानी से चल जाता था मौसम की प्रतिकूलता अथवा उपज नहीं होने पर ये अनाज कोठियां उन्हें भोजन की कमी जैसी महत्वपूर्ण चिंता से दूर रखती थीं इन कोठियों में मोटे अनाज, दालें आदि पारंपरिक ढंग से सहेज कर रखी जाती थीं।

अधिकांशतः घरों के निर्माण के दौरान ही कोठियों का निर्माण किया जाता था लेकिन समय बदलने के साथ ही खेती की पद्धति व खेती के अनाजों में बदलाव ने कोठियों के महत्व को कम कर दिया पहले जहां छोटी बडी अनाज कोठियांं की संख्या उपज की मात्रा व उनकी उपयोगिता को निर्धारित कर बनाई जाती थीं वहीं अब बैगाओं के यहां सीमित संख्या में कोठियां मिलती हैं आजकल कोठियां भी आधुनिकता के रंग में रंग गई हैं या सरकारी कमीषनखोरी के चक्कर में कोठियों पर भी बाजार हावी हो गया है और प्लास्टिक के ड्रम व लोहे की चादर की कोठियां भी दिखने लगी हैं।

अब अनाज संग्रहण की सबसे पुराने तरीके को धीरे धीरे जनजातियां अपने से दूर करती जा रही है और मिट्टी, मटके, बांस व लौकी से बनने वाली कोठियों से दूर हो रहा है यानि अब भविष्य में भोजन की व्यवस्था करने में रूचि नहीं दिखाई जा रही या यह कहें कि अब उतनी उपज ही नहीं होती कि उसे लंबे समय तक सहेज कर रखने की जरूरत रहती हो पूर्व में जो कोठियां अनाज संग्रहण के लिये बनाई जाती थीं अब उनका प्रचलन कम होता जा रहा है पहले मरसा, खुडरी, तूमा व कोठी बनाई जाती थीं लेकिन अब उनकी जगह प्लास्टिक व लोहे की चादर से बनी कोठियां आ गई हैं।

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