देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने का दिन है महाशिवरात्रि, जानिए कथा और मुहूर्त 

फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि इस साल 11 मार्च गुरुवार को पड़ रही है। चतुर्दशी तिथि 11 मार्च को दोपहर 02 बजकर 39 मिनट पर शुरू होगी और 12 मार्च शुक्रवार को दोपहर 03 बजकर 02 पर इसका समापन होगा।  चूँकि महाशिवरात्रि पर रात्रि की तिथि की मान्यता है इसलिए व्रत और पूजा 11 मार्च को ही की जाएगी।

भोपाल, डेस्क रिपोर्ट। त्योहारों के देश भारत में वैसे तो बहुत से पर्व और त्योहार हैं जिस दिन ईश्वर की उपासना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, लेकिन इनमें से कुछ त्योहार और पर्व ऐसे हैं जिन दिन व्रत रखने से और उस पर्व के देवता की उपासना करने से मन को शांति और ऊर्जा प्राप्त होती है। ऐसा ही एक पर्व है महाशिवरात्रि (Mahashivratri) ।

देवों के देव महादेव की आराधना का पर्व महाशिवरात्रि (Mahashivratri) हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानी चौदस को मनाया जाता है। इस साल ये कल गुरुवार 11 मार्च को मनाया जाएगा। महाशिवरात्रि (Mahashivratri) से जुड़ी बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि इस रात को शिव और शक्ति का मिलन हुआ था वहीं कुछ कथाओं में कहा गया है कि इस दिन भगवान शिव दिव्य ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। यहाँ हम आपको अलग अलग कथाओं के बारे में बता रहे हैं।

पहली कथा के अनुसार महाशिवरात्रि (Mahashivratri) के दिन भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था और शिव जी ने वैराग्य से गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। इसलिए शिव शक्ति के मिलन की रात्रि को शिवरात्रि कहा जाता है और भगवान भोलेनाथ के भक्त इस दिन उनकी पूजा करते  प्रसन्न रखने के लिए व्रत करते हैं।

दूसरी कथा ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान के बीच श्रेष्ठता सिद्ध करने के विवाद से जुडी हुई है। किवदंती है कि एक बार परमपिता ब्रह्मा जी और पालनहार विष्णु जी के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि उन दोनों में से श्रेष्ठ कौन है? जब विवाद हो रहा था तभी वहां एक अग्नि स्तम्भ प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई कि जो भी इस स्तम्भ के आदि और अंत को जान लेगा वो ही श्रेष्ठ कहलायेगा। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी और जगत के पालनहार विष्णु जी ने कई वर्षों  तक इस अग्नि स्तम्भ के आदि और अंत को जानने का प्रयास किया लेकिन उनके प्रयास सफल नहीं हुए। तब विष्णु जी और ब्रह्मा जी ने अग्नि स्तम्भ के सामने अपनी अपनी हार स्वीकार करते हुए प्रार्थना की कि आप ही अपना रहस्य बताइये।

ब्रह्मा जी और विष्णु जी की प्रार्थना सुनने के बाद भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ तो आप दोनों ही हैं लेकिन मैं आदि और अंत से परे परब्रह्म हूँ। बाद विष्णु जी और ब्रह्मा जी ने अग्नि स्तम्भ की पूजा की जिसके बाद वो दिव्य अग्नि स्तम्भ दिव्य ज्योतिर्लिंग में बदल गया। कहा जाता है कि जिस दिन ये घटना घटी उस दिन फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। तब भगवान शिव ने कहा कि इस दिन जो भी मनुष्य मेरी पूजा करेगा,  व्रत करेगा,  उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी और कष्ट दूर होंगे। तभी से इस दिन को महाशिवरात्रि (Mahashivratri) के रूप में मनाया जाने लगा है।

तीसरी कथा ये भी प्रचलित है कि महाशिवरात्रि (Mahashivratri) के दिन ही भगवान शिव 64 शिवलिंग के रूप में संसार में प्रकट हुए थे। हालांकि संसार में लोग शिव जी के 12 ज्योतिर्लिंगों को ही ढूंढ पाए और उन्हीं की पूजा करते हैं।

इस साल महाशिवरात्रि की पूजा का समय ऐसा रहेगा 

फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि इस साल 11 मार्च गुरुवार को पड़ रही है। चतुर्दशी तिथि 11 मार्च को दोपहर 02 बजकर 39 मिनट पर शुरू होगी और 12 मार्च शुक्रवार को दोपहर 03 बजकर 02 पर इसका समापन होगा।  चूँकि महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर रात्रि की तिथि की मान्यता है इसलिए व्रत और पूजा 11 मार्च को ही की जाएगी।

ज्योतिषियों के अनुसार इस दिन निशिता काल में पूजा का समय 11 मार्च को रात 12 बजकर 06  मिनट से 12  बजकर 55 मिनट तक रहेगा। रात्रि प्रथम प्रहर की पूजा का समय 11 मार्च को शाम 06 बजकर 27 मिनट से रात 09 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। रात्रि द्वितीय प्रहर की पूजा का समय 11 मार्च को रात 09 बजकर 29 मिनट से 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। रात्रि तृतीय प्रहर की पूजा का समय 11 मार्च को रात 12 बजकर 31 मिनट से 12 मार्च के तड़के 03 बजकर 31 मिनट तक रहेगा और रात्रि चतुर्थ प्रहर की पूजा का समय 12 मार्च को तड़के 03 बजकर 32 मिनट से सुबह 06 बजकर 34 मिनट तक रहेगा।

जो लोग महाशिवरात्रि (Mahashivratri) का व्रत रखेंगे उन लोगों को 12 मार्च शुक्रवार की सुबह 06 बजकर 34 मिनट से दोपहर 03 बजकर 02 मिनट तक मध्य पारण कर लेना चाहिए। पारण करने के बाद ही व्रत पूरा माना जाता है और फलदायी होता है।