लोक आस्था का महापर्व चैती छठ (Chaiti Chhath) का आज तीसरा दिन है। इसे संध्या अर्घ्य के नाम से भी जाना जाता है। जब व्रती शाम में ढलते सूरज की पूजा कर उन्हें अर्घ्य देते हैं। बता दें कि इस पर्व को सबसे कठिन माना जाता है। उपवास रखने वाले भक्त 36 घंटे निर्जला व्रत रखते हैं।
पंचांग के अनुसार, आज यानी 3 अप्रैल को संध्या अर्घ्य देने का समय शाम 06 बजकर 40 तक है। यह पर खासकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्से में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यहां के लोग किसी भी त्यौहार का इंतजार वैसे नहीं करते, जिस प्रकार वह छठ पूजा का इंतजार करते हैं।

मिलती है सुख-शांति
किसी भी पर्व त्यौहार में उगते हुए सूर्य देव की ही पूजा अर्चना की जाती है, लेकिन छठ पूजा इसलिए भी खास है, क्योंकि यहां उगते और डूबते सूरज की पूजा की जाती है। मान्यता ऐसी है कि सूर्यास्त के समय अर्घ्य देने से जीवन में चल रही सभी कठिनाइयां दूर होती है। साथ ही सूर्य देव और छठी मां की कृपा से परिवार में सुख और शांति बनी रहती है। पौराणिक ग्रंथों में भी छठ का उल्लेख पाया जाता है।
दो बार मनाई जाती है छठ
छठ पूजा साल में दो बार मनाई जाती है, जिसे चैती छठ पूजा और कार्तिक छठ पूजा के नाम से जाना जाता है। चैती छठ पूजा चैत्र महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, पंचमी, षष्टी और सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। वहीं, कार्तिक छठ पूजा दिवाली के 6 दिन बाद कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, पंचमी, षष्टी और सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। चैती छठ से ज्यादा कार्तिक महीने में पढ़ने वाले छठ के बारे में लोग बहुत ही अधिक सुने और जानते हैं। बहुत कम लोगों को ही इसके बारे में पता होता है।
चैती छठ का महत्व
चैती छठ पूजा के महत्व की बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की रचना का पहला दिन चैत्र नवरात्रि का पहला दिन था। इस दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। उस समय चारों तरफ अंधकार और जल ही जल था। ऐसे में भगवान विष्णु की आंख खुलते ही सूर्य और चंद्रमा की रचना हुई और ब्राह्मणी शक्ति से योग माया का जन्म हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार, योग माया जी ने सूर्य की पहली किरण को उत्पन्न किया, जिसे देवसेना माता कहा जाता है। इसी कारण देवसेना माता और सूर्य देव को भाई-बहन भी माना गया है। सृष्टि के छठवें दिन संसार को प्रकाश और ऊर्जा की प्राप्ति हुई, इसलिए सृष्टि देवी और सूर्य देव की आराधना के लिए छठ पर्व मनाया जाता है। इस दिन देवसेना माता ही षष्टी देवी के रूप में पूजी जाती हैं, जिन्हें छठी मैया भी कहा जाता है।
बीमारियां होती हैं ठीक
चैती छठ पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक गर्मी और प्रकाश प्रदान करने के लिए सूर्य को धन्यवाद देने का एक तरीका माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान भगवान सूर्य को अर्घ्य देने से कई तरह की बीमारियां ठीक हो जाती है। इस दौरान व्रती नदी या तालाब के किनारे दूध, जल और गन्ने का रस लेकर अर्घ्य देते हैं। वहीं, प्रसाद के रूप में ठेकुआ, चावल के लड्डू और फल भोग के तौर पर अर्पित किए जाते हैं।
(Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। MP Breaking News किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।)