डॉक्टरों का गुस्सा, 'अब कमिश्नर-कलेक्टर को नहीं कहेंगे 'सर', इलाज के लिए नहीं जायेंगे घर'

ग्वालियर। जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में प्रशासकीय अधिकारियों के बढ़ते दखल से ग्वालियर जिले के डॉक्टर्स में गुस्सा है । जिसके बाद डॉक्टर्स ने उनके बहिष्कार का एलान किया है। एक बैठक कर सरकारी और निजी संस्थानों के डॉक्टर्स ने निर्णय लिया है कि भविष्य में वे किसी भी आयोजन में प्रशासकीय अधिकारी को अतिथि की हैसियत से नहीं बुलायेंगे और ना ही उनके बुलावे पर उनके घर जाकर उनका या उनके परिजन का इलाज नहीं करेंगे। 

पिछले कुछ महीनों से प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी जैसे संभागीय आयुक्त, कलेक्टर, एडीएम, एसडीएम आदि  लगातार सरकारी और प्राइवेट  अस्पतालों का औचक निरीक्षण कर रहे हैं। और अपने तरीके से दिशा निर्देश दे रहे हैं।  डॉक्टर्स इसे उनकी दखलंदाजी बता रहे हैं। इए रोकने के लिए डॉक्टर्स एकजुट हो गए हैं इसे लेकर बुधवार को ग्वालियर रीजन डॉक्टर्स एसोसिएशन की बैठक गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में आयोजित की गई जिसमें मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, नर्सिंग होम एसोसिएशन, मेडिकल ऑफिसर एसोसिएशन, एवं जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन के पदाधिकारी, वरिष्ठ सदस्य एवं अन्य सक्रिय सदस्य उपस्थित हुए। उक्त बैठक का उद्देश्य

मध्यप्रदेश शासन के प्रशासकीय अधिकारियों द्वारा बनाया गया नया क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट यानी काला कानून एवं प्रशासनिक अधिकारियों का अनावश्यक शासकीय स्वास्थ्य संस्थानों एवं निजी संस्थानों एवं अस्पतालों में बढ़ते हस्तक्षेप के कारण चिकित्सकों को निडर एवं निर्भीक होकर मरीजों को इलाज देने में होने वाली असुविधा के कारण उपजे असंतोष और गरीब मरीजों के लिए महंगे होता इलाज था।  बैठक में सभी ने स्वास्थ्य नीतियों एवं व्यवस्थाओं के कारण होने वाली समस्याओं पर चर्चा की । सभी ने एक स्वर में सरकार द्वारा नया लाए जाने वाले काले कानून यानी क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को सिरे से नामंजूर कर दिया। सदस्यों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रशासकीय अधिकारियों द्वारा अपनी स्वयं की टीआरपी बढ़ाने एवं झूठी शान की खातिर निजी एवं शासकीय चिकित्सालयों, मेडिकल कॉलेज इत्यादि में अनावश्यक दखलअंदाजी की जाती है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता । बैठक में शासन के द्वारा विभिन्न आदेश या नियम जोकि नर्सिंग होम, हेल्थ डिपार्टमेंट एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के लिए जारी किए गए हैं उनमें व्याप्त आपसी विसंगतियां एवं अव्यावहारिक होने के कारण उनमें सुधार की मांग की गई साथ ही स्वास्थ्य विभाग एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में कमिश्नर प्रणाली को समाप्त करने की मांग की गई  एवं स्वशासी संस्थाओं का अध्यक्ष, डायरेक्टर, कमिश्नर इत्यादि पदों पर किसी वरिष्ठ चिकित्सक कोही नियुक्त करने। की पुरजोर मांग की गई। सदस्यों ने कहा कि सफाई, सुरक्षा आदि के दिए जाने वाले कॉन्ट्रैक्ट स्थानीय स्तर की संस्थाओं या लोगों को दिए जाने चाहिए ना की किसी अन्य राष्ट्रीय एजेंसी को । चिकित्सकों के साथ एवं अस्पतालों में होने वाले झगड़े मारपीट एवं तोड़फोड़ को रोकने के लिए सख्त नए कानून एवं कदम उठाने चाहिए।


प्रशासकीय अधिकारियों के  खिलाफ फूटा गुस्सा

बैठक में प्रशासकीय अधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण एवं उनके दुर्व्यवहार की वजह से लोगों में बहुत रोज निराशा एवं गुस्सा भी दिखाई दिया इसके चलते  सदस्यों ने सुझाव दिए कि आगे से प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों को किसी भी सार्वजनिक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में किसी भी चिकित्सकीय संस्थाओं द्वारा नहीं बुलाया जाएऔर शहर की अन्य सामाजिक संस्थाओं से भी अनुरोध किया जाए कि वह भी उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में ना बुलाइ । अगर ऐसा किया जाता है तो ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार किया जाए। सदस्यों ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों,उनके परिवार के सदस्यों या अन्य संबंधित लोगों के रोजमर्रा के इलाज के लिए उनके निवास या दफ्तर पर उनके बुलाए जाने पर कोई भी चिकित्सक देखने नहीं जाए। कई प्रशासनिक अधिकारी चिकित्सकीय संस्थानों में पदस्थ चिकित्सकों से कैडर एवं वेतनमान में जूनियर होने के कारण उन्हें किसी भी  प्रकार   के निरीक्षण के लिए साथ में नहीं जाएं और "सर"जैसे शब्द से संबोधित नहीं करें। बैठक में अन्य सुझावों एवं समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए सभी चिकित्सकों ने एक आचार संहिता बनाकर उस पर अमल कैसे किया जावे विचार करने का निर्णय लिया है। यह आचार संहिता कुछ ही समय में सभी चिकित्सकों को भेजी जाएगी  और एक सभी सदस्यों की बड़ी बैठक निकट भविष्य में आयोजित की जावेगी जिस पर चर्चा कर उसको व्यवहारिक रूप से अमल सुनिश्चित किया जा सके।  अंत में तय हुआ कि अगर भविष्य में कोई भी प्रशासनिक अधिकारी निरीक्षण के लिए आता है तो सभी चिकित्सक अपना काम छोड़कर बाहर आ जावेंगे।

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