Parenting Tips: जानें कब भेजना चाहिए बच्चों को प्ले स्कूल, इन बातों का रखना चाहिए ध्यान

Parenting Tips: बच्चों को प्ले स्कूल कब भेजें? यह सवाल हर माता-पिता के मन में आता है, 2 से 3 साल की उम्र बच्चों को प्ले स्कूल भेजने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।इस उम्र में बच्चे सामाजिक, भावनात्मक और संज्ञानात्मक रूप से विकास के लिए तैयार होते हैं।

भावना चौबे
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Parenting Tips: बच्चों के शुरुआती साल उनके विकास की नींव रखते हैं। इस दौरान माता-पिता अक्सर सही उम्र को लेकर असमंजस में रहते हैं, खासकर जब बात स्कूल जाने की हो। प्ले स्कूल बच्चों के सर्वांगीण विकास में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन यह सवाल बना रहता है कि आखिर उन्हें कब प्ले स्कूल भेजना सबसे अच्छा होता है? आमतौर पर, 2 से 3 साल की उम्र को उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इस दौरान बच्चे सामाजिक रूप से खेलने-कूदने और दोस्त बनाने के लिए तैयार होते हैं।

साथ ही, उनकी भावनात्मक और संज्ञानात्मक विकास भी इस उम्र में तेजी से हो रहा होता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर बच्चे की विकास गति अलग होती है। कुछ बच्चे 18 महीने में ही प्ले स्कूल के माहौल के लिए तैयार हो सकते हैं, वहीं कुछ को 3 साल से ज्यादा उम्र तक का समय लग सकता है। इसलिये माता-पिता को बच्चे के विकास के संकेतों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे दूसरे बच्चों के साथ खेलने में रुचि, अपनी भावनाओं को व्यक्त करना और निर्देशों को समझना।

प्ले स्कूल भेजने के फायदे अनगिनत हैं, जिनमें सामाजिक कौशल का विकास, आत्मविश्वास में वृद्धि, भाषा और संचार का विकास, शुरुआती शिक्षा की नींव रखना और समूह में काम करने की क्षमता सीखना शामिल हैं। लेकिन यह भी जरूरी है कि माता-पिता सही स्कूल का चुनाव करें, बच्चे को वातावरण के लिए तैयार करें, उससे बातचीत करें और स्कूल के शिक्षकों के साथ संपर्क बनाए रखें। सही उम्र का ध्यान रखने और इन बातों का ख्याल रखने से माता-पिता यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्ले स्कूल का अनुभव उनके बच्चे के लिए सकारात्मक और विकासदायक हो।

कब भेजना चाहिए बच्चों को प्ले स्कूल

कई माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा जल्द से जल्द सीखना शुरू कर दे, और इसलिए वे जल्दबाजी में उन्हें प्लेस्कूल भेजने लगते हैं। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर बच्चे की विकास गति अलग होती है, और जल्दबाजी उल्टी भी पड़ सकती है। बच्चे को प्लेस्कूल में तभी भेजें जब वो बच्चे को प्लेस्कूल में स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने में सक्षम होना चाहिए। बच्चे को अपनी बुनियादी जरूरतों को व्यक्त करने और शिक्षकों और साथी बच्चों से बातचीत करने में सक्षम होना चाहिए। बच्चे को खुद से थोड़ा बहुत खाना सीख लेना चाहिए, ताकि वो प्लेस्कूल में भूखे न रहें। आमतौर पर, 3 या 4 साल की उम्र बच्चों को प्लेस्कूल भेजने के लिए उपयुक्त होती है। इस उम्र में बच्चे सामाजिक रूप से खेलने-कूदने और दोस्त बनाने के लिए तैयार होते हैं, और उनकी भाषा, भावनात्मक और संज्ञानात्मक विकास भी तेजी से हो रहा होता है।

क्या-क्या सीखते हैं बच्चे प्ले स्कूल में

बच्चों के विकास में कई पहलू होते हैं, और सामाजिक विकास उनमें से एक महत्वपूर्ण पहलू है। यह विकास परिवार में ही शुरू होता है, जहाँ बच्चे अपने माता-पिता, भाई-बहनों और अन्य सदस्यों के साथ घुलना-मिलना सीखते हैं। जब बच्चा परिवार में सभी के साथ घुलना-मिलना सीख जाता है, तो उसे प्लेस्कूल में भेजने का समय उपयुक्त होता है। प्लेस्कूल में बच्चे अन्य बच्चों के साथ खेलते-कूदते हैं, दोस्त बनाते हैं, और सामाजिक नियमों को सीखते हैं। यह सामाजिक विकास उन्हें स्कूल में भी आसानी से घुलने-मिलने में मदद करता है। प्लेस्कूल में बच्चे कई चीजें सीखते हैं, जैसे दूसरों के साथ बातचीत करना, अपनी भावनाओं को व्यक्त करना, समूह में काम करना, नियमों का पालन करना, साझा करना , सहयोग करना।

(Disclaimer- यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं के आधार पर बताई गई है। MP Breaking News इसकी पुष्टि नहीं करता।)


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भावना चौबे

भावना चौबे

इस रंगीन दुनिया में खबरों का अपना अलग ही रंग होता है। यह रंग इतना चमकदार होता है कि सभी की आंखें खोल देता है। यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि कलम में बहुत ताकत होती है। इसी ताकत को बरकरार रखने के लिए मैं हर रोज पत्रकारिता के नए-नए पहलुओं को समझती और सीखती हूं। मैंने श्री वैष्णव इंस्टिट्यूट ऑफ़ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन इंदौर से बीए स्नातक किया है। अपनी रुचि को आगे बढ़ाते हुए, मैं अब DAVV यूनिवर्सिटी में इसी विषय में स्नातकोत्तर कर रही हूं। पत्रकारिता का यह सफर अभी शुरू हुआ है, लेकिन मैं इसमें आगे बढ़ने के लिए उत्सुक हूं। मुझे कंटेंट राइटिंग, कॉपी राइटिंग और वॉइस ओवर का अच्छा ज्ञान है। मुझे मनोरंजन, जीवनशैली और धर्म जैसे विषयों पर लिखना अच्छा लगता है। मेरा मानना है कि पत्रकारिता समाज का दर्पण है। यह समाज को सच दिखाने और लोगों को जागरूक करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। मैं अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करूंगी।

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