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विश्व पर्यावरण दिवस : 20 साल बाद पानी, 50 साल बाद जंगल, 100 साल बाद ऑक्सीजन के लिए तरस सकती है दुनिया

Written by:Shruty Kushwaha
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हमें याद रखना हो होगा कि प्रकृति हमारी जरूरत है, विकल्प नहीं। आज लगाया गया एक पौधा आने वाले सालों में किसी को छाया देगा, किसी को ऑक्सीजन और धरती को बचाने में अपना बड़ा योगदान भी। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि पर्यावरण हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है, प्रश्न यह है कि क्या पर्यावरण को तबाह कर हम बच पाएंगे। प्रकृति सुरक्षित रहेगी तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित होगा। इसलिए हमें अपनी खातिर पर्यावरण को सहेजना होगा।

जो चीजें सबसे कीमती हैं वो प्रकृति ने हमें मुफ्त दी हैं। स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी, हरियाली और पेड़-पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ। ये सब हमारे जीवन की बुनियादी जरूरतें हैं और इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन विडंबना है कि जिन प्राकृतिक उपहारों पर हमारा अस्तित्व टिका हुआ है उनकी कद्र करने में हम असफल रहे हैं। यही वजह है कि आज दुनिया बढ़ते प्रदूषण, जल संकट, जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।

पिछले कुछ दशकों में विकास के नाम पर प्रकृति का बड़े पैमाने पर दोहन हुआ है। शहरों के विस्तार के लिए जंगल काटे गए, नदियों को प्रदूषित किया गया और हवा में जहरीले तत्वों की मात्रा लगातार बढ़ती गई। इसका परिणाम यह हुआ कि मौसम का संतुलन बिगड़ने लगा। आज कहीं भीषण गर्मी पड़ रही है तो कहीं बेमौसम बारिश हो रही है। कई क्षेत्रों में जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं और वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास लगातार सिकुड़ता जा रहा है।

अब भी न संभले तो मुश्किल में पड़ जाएगी मानव सभ्यता

आज स्थिति यह हो गई है कि दुनिया के कई बड़े शहरों में स्वच्छ हवा दुर्लभ होती जा रही है। लोग एयर प्यूरीफायर खरीद रहे हैं। कई स्थानों पर लोग पैकेज्ड पानी पर निर्भर हो रहे हैं और बढ़ते तापमान से बचने के लिए कृत्रिम साधनों का सहारा लेना पड़ रहा हैं। यह संकेत है कि प्रकृति द्वारा मुफ्त में दिए गए संसाधनों को अब भी नहीं बचाया तो वो दिन दूर नहीं जब हमें पानी, ऑक्सीजन और हरियाली भी खरीदनी पड़ेगी। विश्व पर्यावरण दिवस सिर्फ एक औपचारिक दिन नहीं, बल्कि इस बात को अच्छे से समझने का अवसर है कि हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं, उसके बदले उसे क्या लौटा रहे हैं। यह दिन हमें चेतावनी भी देता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।

20 साल बाद क्या हो सकती है स्थिति

अगर अगले 10 से 20 वर्षों तक पर्यावरण के साथ यही व्यवहार जारी रहा तो कई दुनिया के कई शहरों में गर्मी के दिन और लंबे तथा खतरनाक हो सकते हैं। भूजल स्तर और नीचे जाएगा जिससे पीने के पानी की समस्या गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि आने वाले दशकों में पानी को लेकर संघर्ष बढ़ सकते हैं। संभव है कि जिस पानी को आज हम सामान्य रूप से इस्तेमाल करते हैं, उसके लिए भविष्य में अधिक कीमत चुकानी पड़े। स्वच्छ हवा वाले क्षेत्रों की मांग भी बढ़ सकती है और लोग प्रदूषण से बचने के लिए महंगे साधनों पर निर्भर हो सकते हैं।

50 साल बाद क्या हो सकती है स्थिति

अगर अगले 50 वर्षों तक हालात नहीं बदले तो पृथ्वी के कई हिस्सों में जंगलों का क्षेत्रफल काफी घट सकता है। अनेक वन्य जीव और पक्षी प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं। कृषि भूमि पर भी असर पड़ सकता है जिससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा। ऐसी स्थिति में फल, सब्जियां और अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थ पहले की तुलना में अधिक महंगे और सीमित हो सकते हैं। आज जो हरियाली सहज दिखाई देती है वह भविष्य में दुर्लभ दृश्य बन सकती है। हो सकता है आपको हरियाली देखने के लिए सिनेमाघरों में या एआई की मदद लेनी पड़े।

100 साल बाद क्या हो सकती है स्थिति

अगर अगले 100 वर्षों तक भी इंसानों ने प्रकृति से छेड़छाड़ जारी रखी तो पृथ्वी का पर्यावरणीय संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और प्राकृतिक संसाधन सबसे मूल्यवान संपत्तियों में शामिल हो सकते हैं। संभव है कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण पाने के लिए विशेष तकनीकों और संसाधनों पर निर्भर रहना पड़े। कई ऐसे जीव-जंतु और पौधे, जिन्हें आज हम सामान्य रूप से देखते हैं तब सिर्फ इतिहास और पुस्तकों का हिस्सा रह जाएं।

छोटी कोशिशें ला सकती हैं बड़े बदलाव

हालांकि यह भविष्य तय नहीं है। इसे बदला जा सकता है। एक पेड़ लगाना, पानी बचाना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना छोटे कदम जरूर हैं, लेकिन इन्हीं छोटे प्रयासों से बड़ा परिवर्तन संभव है। भविष्य की यह तस्वीर डराने के लिए नहीं बल्कि चेताने के लिए है। अच्छी बात यह है कि अभी भी समय हमारे हाथों में है। यदि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, जल संरक्षण करें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें तो हालात बेहतर हो सकते हैं।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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