उपचुनाव: इस सीट का रहा है दिलचस्प इतिहास, कभी राजनारायण नहीं तो कांग्रेस नहीं का दौर भी चला!

बीच में कांग्रेस से चिढऩे वाले राजनारायण कांग्रेस को माँ बता रहे हैं। कहते हैं,माँ का पल्लू छोड़ नहीं सकता। राजनीतिक रूप से अनाथ नहीं होना चाहता। अब वे और उनके पुत्र दोनों कोरोनाकाल में भी एक दिन घर नहीं बैठ रहे हैं। हवेली पर भी मजमा जमने लगा है

उपचुनाव

खंडवा, सुशील विधाणी। जिले की एकमात्र सामान्य सीट से विधायक (MLA) बनने का मौका फिर आ गया है। यह उप चुनाव (by election) है। इसमें दोनों दल पहले सर्वे कर चुके हैं। इस सीट पर कभी रघुराजसिंह और स्व. लोकेंद्रसिंह यानी पिता और पुत्र के बीच ही राजनीतिक तलवारें खिंची थी। अब उपचुनाव में कांग्रेस (congress) से राजनारायणसिंह के पुत्र उत्तमपाल सिंह को कांग्रेस ने मैदान में उतारा है।

राजनारायण 35 साल से पैंतरे खेल रहे हैं। कई बार वे नहीं,तो कांग्रेस नहीं पर काम हुआ। कांग्रेस से राजनारायण पूरी ताकत लगा रहे हैं। बुजुुर्ग के कायदे में पिछड़े, तो उपचुनाव में उनके पुत्र उत्तमपाल को आगे कर दिया। मतलब टिकिट इनके घर में ही मिलना चाहिए। राजनारायण का चुनावी इतिहास भी कांग्रेस के लिए कम डरावना नहीं है। तीन बार विधायक रहे।

हम नहीं तो कांग्रेस नहीं?

पांच बार विधानसभा का चुनाव लड़ा। दो बार तो कांग्रेस में भीतराघात भी किया। अरूण यादव ने तो उनका पार्टी से ही निकाला कर दिया था। वक्त की नजाकत देखिए, कि उपचुनाव में अब राजनारायण की बोली कांग्रेस के लिए बिल्कुल स्वीट हो गई है। बीच में कांग्रेस से चिढऩे वाले राजनारायण कांग्रेस को माँ बता रहे हैं। कहते हैं,माँ का पल्लू छोड़ नहीं सकता। राजनीतिक रूप से अनाथ नहीं होना चाहता। अब वे और उनके पुत्र दोनों कोरोनाकाल में भी एक दिन घर नहीं बैठ रहे हैं। हवेली पर भी मजमा जमने लगा है कांग्रेसियों को यहां पहुंचने पर कभी कप भर चाय नसीब नहीं होती थी l वह अब मेहमानों जैसा भोजन भी कर रहे हैं l चुनावी लंगर जारी है l

यूं उतारा था मतदाताओं ने राजनारायण का गुरूर ?

भूलना नहीं चाहिए कि विधायकी के गुरूर में राजनारायण मतदाताओं को भूल गए थे। नई जीप में क्षेत्र से निकलते थे,तो गाड़ी के शीशे चढ़ा लेते थे। लोगों ने इसका बदला 2008 में लिया। राजनारायण को इस चुनाव में 20 हजार 656 जैसे मतों से हराया था। उन्हें 30 हजार 701 वोट ही मिल पाए थे। राजनारायण को विधानसभा में बैठने का आनंद इतना भाया कि वे चार चुनाव बाद अब भी वहां जाने को लालायित हैं। उम्र के पड़ाव को देखते हुए अब पुत्र राज्य विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ने को बेताब हैं l

दिलचस्प है मांधाता सीट

मांधाता विधानसभा सीट का पुराना नाम निमाडख़ेड़ी था। इस सीट के दावेदारों का इतिहास देखें तो भाजपाई टिकिट के लिए 2013 के चुनाव में बाप-बेटों में छत्तीस का आंकड़ा हो गया था। अब उपचुनाव में कांग्रेस की तस्वीर देखें तो टिकट मिलने के बाद जीत के लिए लालायित हैं। मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते।

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बगावत कर पीछे खींचा था पैर

2013 के चुनाव में दोनों दलों के अधीकृत प्रत्याशियों की नींद उड़ गई थी। कांग्रेस प्रत्याशी नारायण पटेल और भाजपा के प्रत्याशी लोकेन्द्र सिंह तोमर के सामने दोनों ही पार्टी से निर्दलीय चुनावी मैदान में आ गए थे। लंबे समय तक दोनों प्रत्याशी मानने वाले नहीं थे।

चर्चाएं थीं कि 2008 के चुनाव में भाजपा के विधायक लोकेन्द्र सिहं तोमर ने नरेन्द्र तोमर को कहा था कि यह मेरा पहला और आखरी चुनाव होगा। 2013 में तुझे चुनाव लडाऊंगा । वैसे ही 2008 में राजनारायण सिंह को टिकिट मिला था, तब नारायण पटेल ने बगावत कर चुनाव में निर्दलीय परचम लहरा दिया था। इसी कारण राजनारायण जीतने की कगार पर होते हुए भी हार गए थे। बाद में राजनारायण पर केंद्रीय नेताओं का दबाव बना और फार्म उठा लिया था।

 

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