Liquor in MP: HC के फैसले के बाद ठेकेदारों ने सरेंडर की दुकानें, कई जिलों में शुरु हुई शराब की बिक्री

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भोपाल।

मध्यप्रदेश(madhyapradesh) में शराब ठेकेदारों और सरकार(government) के बीच ठनी हो गयी है। जहाँ एक और सरकार अपनी नीतियों की जिद पर है वहीं दूसरी और शराब ठेकेदार भी अपने मांग को लेकर स्पष्ट हैं। इसी बीच हाईकोर्ट(highcourt) के आदेश के बाद शुक्रवार देर रात ठेकेदारों ने दुकानें सरेंडर(surrender) करना शुरू कर दिया है। भोपाल(bhopal), इंदौर(indore), ग्वालियर(gwalior), जबलपुर(jabalpur) सहित कई जिलों में ठेकेदारों ने शराब दुकानें सरकार को सौंप दी हैं।वहीँ कुछ जिलों में बिक्री शुरू कर दी गयी है।

दरअसल सरकारों द्वारा अपनी मांगों के पूरा नहीं होने पर शराब ठेकेदारों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। जहाँ गुरुवार को कोर्ट ने सभी शराब ठेकेदारों को कहा कि सरकार ने जो नई नीति बनाई है वो जिन ठेकेदारों को मंजूर है वे तीन दिन के अंदर शपथ पत्र के साथ हाईकोर्ट के समक्ष रखें और जिन्हें मंजूर नहीं है वे अपनी दुकान सरेंडर कर सकते है। इस दौरान सरकार की नई नीति को नहीं मानने वालों पर सरकार कोई रिकवरी नहीं करेगी। जिसके बाद शुक्रवार को भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर के कई ठेकेदारों ने दुकानें शराब को सौंप दी है। बताया जा रहा है कि कुल टेंडर के मुताबिक शराब ठेकेदारों ने 10460 करोड़ में से 7200 करोड़ की दुकानें सरकार को सौंप दी है जिससे कुल 3000 करोड़ का घाटा हुआ है।

इधर कुछ जिलों जैसे सीहोर, राजगढ़, रायसेन, बैतूल, आगर, विदिशा और शाजापुर में ठेकेदार दुकानें शुरू करने को राजी हुए हैं। वहीँ सरकार के पास अब केवल दो विकल्प बचे हैं, या तो वो आबकारी विभाग से दुकानें चलवाए या फिर नए सिरे से टेंडर जारी कर दुकान की नीलामी करें।

वहीँ इससे पहले हाई कोर्ट ने सरकार को कहा था कि ठेकेदारों के खिलाफ याचिका के लंबित रहने तक कोई सख्त कारवाई न की जाए। पिछली सुनवाई के दौरान दी गई अंडरटेकिंग के बाद भी ठेकेदारों पर कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया है। वहीं जिन ठेकेदारों को सरकार की नई नीति की शर्तें मंजूर हैं, उन्हें 3 दिन में एफिडेविट देना होगा। 27 मई के बाद ठेकेदारों को नोटिस आदि देना कोर्ट ने अवमानना माना। हाई कोर्ट ने कहा था कि ठेकेदारों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होगी । ठेकेदारों की ओर से कहा गया था कि सरकार ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र पर सख्त कार्रवाई न करने का अभिवचन दिया था।

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