नगरीय निकाय चुनाव

भोपाल, डेस्क रिपोर्ट। गुरुवार को मध्यप्रदेश (madhya pradesh) में नगरीय निकाय चुनावों (Urban body elections) के जल्द होने की खबरें तेजी के साथ उठी लेकिन हकीकत में इनमें अभी बड़ा कानूनी रोड़ा है। जिसके निपटारे के बिना हाल फिलाल नगरीय निकाय चुनाव होना संभव नहीं है।

गुरुवार को मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी बसंत प्रताप सिंह (basant pratap singh) द्वारा सभी जिलों के कलेक्टर को दिए गए निर्देश, कि नगरीय, निकाय के चुनाव की तैयारियां जल्द पूरी की जाए यह अटकलें तेज हो गई कि नगरीय निकाय के चुनाव जल्द होने वाले हैं। अनुमान लगाया गया कि सितंबर अक्टूबर तक नगरीय निकाय के चुनाव संपन्न करा लिए जाएंगे। लेकिन इन सबके बीच इन चुनावों में सबसे बड़ा रोड़ा कानूनी है, जिसे भुला दिया गया।

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दरअसल नगरीय निकाय चुनावों को लेकर जिस तरह का आरक्षण सरकार ने लागू किया था। उसे देखते हुए हाईकोर्ट की जबलपुर-ग्वालियर और इंदौर बेन्च मे अलग-अलग चार आदेश जारी किए थे और न केवल आरक्षण (reservation) को निरस्त किया था बल्कि दोबारा से आरक्षण करने के आदेश के साथ-साथ वर्तमान नियमों को भी समाप्त कर दिया था। ऐसे में सरकार के पास दो ही विकल्प थे कि वह या तो हाई कोर्ट की गाइडलाइन (high court guideline) का पालन करते हुए दोबारा से आरक्षण प्रक्रिया के नियम बनाकर आरक्षण लागू करें या फिर सुप्रीम कोर्ट में जाए।

ऐसे में राज्य सरकार ने स्पेशल लीव पिटिशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की। जिसमें हाई कोर्ट के चारों आदेशों को चुनौती दी गई है। अब जब तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तब तक सरकार चुनाव नहीं करा सकती। मध्यप्रदेश में 407 नगरीय निकाय मे से अधिकांश का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और ऐसे में नगर सरकार के गठन के लिए जल्द से जल्द चुनाव होना जरूरी है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के आए बिना यह चुनाव हाल फिलहाल संभव नहीं दिखते।