Mahashivratri: MP के इस जिले के प्रसिद्द मंदिर में होता है शिवलिंग का अखंड अभिषेक

यह स्थान पांच याज्ञिक वृक्षों के मध्य स्थित है। इसकी एक और विशेषता है कि बिल्व पत्र का पेड़ ठीक शिवलिंग के ऊपर होने से स्वमेव बिल्व पत्र अर्पित हो जाते हैं

देवास/बागली, सोमेश उपाध्याय। देवास जिले के  बागली नगर से तीन किलोमीटर की दूरी पर विध्यांचल पर्वत माला में स्थित प्रसिद्ध जटाशंकर तीर्थ पर आज महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। यहां भगवान जटाशंकर का अखंड जलाभिषेक करने वाली जलधारा है। यहां गोमुख से भगवान जटाशंकर का अखण्ड जलाभिषेक होता है।हालांकि जलधारा का स्रोत पता लगाने में विशेषज्ञ भी असफल रहे हैं।

आपको बता दें कि तीर्थ ब्रह्मलीन संत केशवदासजी त्यागी (फलाहारी बाबा) के सानिध्य में ही ये स्थान प्रख्यात हुआ।यहां प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर शिवशक्ति महायज्ञ व भव्य मेले का आयोजन होता है। यह परम्परा 56 वर्ष पहले फलाहारी बाबा ने शुरू की थी जो आज तक अनवरत जारी है। यह स्थान पांच याज्ञिक वृक्षों के मध्य स्थित है। इसकी एक और विशेषता है कि बिल्व पत्र का पेड़ ठीक शिवलिंग के ऊपर होने से स्वमेव बिल्व पत्र अर्पित हो जाते हैं। यहां का शिवलिंग नील लोहित है यानी लाल और नीले रंग से चंदन, तिलक और ओम की आकृति उस पर प्राकृतिक रूप से बनी है।

Mahashivratri: MP के इस जिले के प्रसिद्द मंदिर में होता है शिवलिंग का अखंड अभिषेक

कहा जाता है कि प्राचीन समय में रामायणकालीन जटायु ने यहां तपस्या की थी, इसलिए इसे जटाशंकर नाम से जाना जाता है। प्राचीन समय में घना जंगल मंदिर के आसपास हुआ करता था और शेर सहित अन्य जंगली जानवर यहां दिखाई देते थे। मुकुंदमुनि पं. रामाधार द्विवेदी ने बताया कि दिवंगत महंत फलाहारी बाबा शेर की सवारी भी करते थे।
तीर्थ पर मनोकामना पूरी होने पर तुलादान भी किया जाता है। महामृत्युंजय, काल सर्पयोग, त्रिपिंडी शास्त्र आदि के विशिष्ट अनुष्ठान भी होते हैं। वर्ष 2007 से यहां अखंड रामायण पाठ भी चल रहा है। इस स्थान को सर्वाधिक ऊर्जा फलाहारी बाबा ने प्रदान की और अपनी तपस्या से यहां का विकास किया।

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शिवरात्रि पर होते हैं विशेष आयोजन : तीर्थ पर महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर चारों प्रहर की पूजा, अभिषेक व पाठ होते हैं। इसमें वाग्योग चेतना पीठम्‌ बागली के आचार्यो द्वारा भगवान जटाशंकर का महारुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्रों का जाप, पंचाक्षर मंत्र जाप, सहस्त्रार्चन और यज्ञ आदि क्रियाएं होती हैं। श्रावण मास में 51 हजार पार्थिव लिंगों का निर्माण और पूजन भी होता है।