उज्जैन।
प्रदेश भर में सोमवार को शनि जयंती व सोमवती अमावस्या मनाई गई। अपने सुहाग की लम्बी आयु के लिए महिलाओं ने वट सावित्री पूजन की। ऐसा माना जाता है कि हिंदी महीने के अनुसार किसी भी मास में कृष्ण पक्ष की अमावस्या यदि सोमवार के दिन होती है तो उसे ही सोमवती अमावस्या कहते हैं।

हिन्दू धर्म में इस पर्व का अत्यधिक महत्त्व होता है। आज ज्येष्ठ मास की अमावस्या होने के कारण आज इस तिथि के दो महत्व हुए- पहला शनिदेव के जन्म से जुड़ा है तो दूसरा पतिव्रता नारी सावित्री से। आज प्रदेश भर में महिलाओं व्रत रखकर पूजन पाठ किया।
आज ही के दिन हुआ था शनिदेव का जन्म
ऐसी मान्यता है कि आज सनी देव का जन्म हुआ था। सोमवती अमावस्या का शनि जयंती के कारण महत्व बढ़ जाता है। भगवान् शनिदेव अपने अच्छे भक्तों की मनोकामनाए जरूर पूरा करते हैं।
पति की दीर्घायु के लिए पत्नियाँ रखती है वट सावित्री व्रत
वट सावित्री व्रत में पूजन सामग्री का खास महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि सही पूजन सामग्री के बिना की गई पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पूजन सामग्री में बांस का पंखा, चना, लाल या पीला धागा, धूपबत्ती, फूल, कोई भी पांच फल, जल से भरा पात्र, सिंदूर, लाल कपड़ा आदि का होना अनिवार्य है। इस दिन महिलाएं सुबह उठकर नित्यकर्म से निवृत होने के बाद स्नान आदि कर शुद्ध हो जाती हैं फिर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। पूजन की सारी सामग्री को एक टोकरी, प्लेट या डलिया में रख कर बरगद के वृक्ष के नीचे सफाई करने के बाद वहां सभी सामग्री रखने के बाद स्थाग ग्रहण करतीं हैं। इसके
विद्वानों के अनुसार यह है पौराणिक कथा?
सोमवती अमावस्या की पौराणिक कथा के मुताबिक एक व्यक्ति के सात बेटे और एक बेटी थी। उसने अपने सभी बेटों की शादी कर दी लेकिन, बेटी की शादी नहीं हुई। एक भिक्षु रोज उनके घर भिक्षा मांगने आते थे। वह उस व्यक्ति की बहूओं को सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद तो देता था लेकिन उसने उसकी बेटी को शादी का आशीर्वाद कभी नहीं दिया। बेटी ने अपनी मां से यह बात कही तो मां ने इस बारे में भिक्षु से पूछा, लेकिन वह बिना कुछ कहे वहां से चला गया। इसके बाद लड़की की मां ने एक पंडित से अपनी बेटी की कुंडली दिखाई। पंडित ने कहा कि लड़की के भाग्य में विधवा बनना लिखा है।
मां ने परेशान होकर उपाय पूछा तो उसने कहा कि लड़की सिंघल द्वीप जाकर वहां रहने वाली एक धोबिन से सिंदूर लेकर माथे पर लगाकर सोमवती अमावस्या का उपवास करे तो यह अशुभ योग दूर हो सकता है। इसके बाद मां के कहने पर छोटा बेटा अपनी बहन के साथ सिंघल द्वीप के लिए रवाना हो गया। रास्ते में समुद्र देख दोनों चिंतित होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उस पेड़ पर एक गिद्ध का घोंसला था। मादा गिद्ध जब भी बच्चे को जन्म देती थी, एक सांप उसे खा जाता था। उस दिन नर और मादा गिद्ध बाहर थे और बच्चे घोसले में अकेले थे। इस बीच सांप अाया तो गिद्ध के बच्चे चिल्लाने लगे। यह देख पेड़ के नीचे बैठी साहूकार की बेटी ने सांप को मार डाला। जब गिद्ध और उसकी पत्नी लौटे, तो अपने बच्चों को जीवित देखकर बहुत खुश हुए और लड़की को धोबिन के घर जाने में मदद की। लड़की ने कई महीनों तक चुपचाप धोबिन महिला की सेवा की। लड़की की सेवा से खुश होकर धोबिन ने लड़की के माथे पर सिंदूर लगाया। इसके बाद रास्ते में उसने एक पीपल के पेड़ के चारों ओर घूमकर परिक्रमा की और पानी पिया। उसने पीपल के पेड़ की पूजा की और सोमवती अमावस्या का उपवास रखा। इस प्रकार उसके अशुभ योग का निवारण हो गया।