पीसीसी चीफ की दौड़ से बाहर हो सकते हैं सिंधिया, इन नेताओं का नाम आगे

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भोपाल। 15 साल का वनवास खत्म कर कांग्रेस सत्ता में तो आ गई लेकिन उसके सामने लगातार चुतनौतियों का पहाड़ खड़ा है। सीएम पद के लिए चली लंबी खींचतान के बाद अब प्रदेश अध्यक्ष के पद को लेकर दौड़ शुरू हो गई है। कांग्रेस का एक खेमा सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए दिल्ली तक मांग कर रहा है। उनके पक्ष में करीब दो दर्जन विधायक सिंधिया के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन्होंने दिल्ली पहुंचकर सांसद सिंधिया के सरकारी आवास पर अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन भी किया। 

सिंधिया खेमें से इमरती देवी, प्रद्युमन सिंह तोमर, मुन्नालाल गोयल, बनवारीलाल शर्मा, बैजनाथ कुशवाहा, लाखन सिंह यादव और गोविंद राजपूत शामिल रहे। प्रदेश प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी के मुताबिक रविवार को सिंधिया ने सभी विधायकों से वापस जाने के लिए कहा था। उन्होंने सभी विधायकों को सीएम के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए कहा था। जो सोमवार को संपन्न हुई। उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि उन्होंने कभी भी किसी पद के लिए मांग नहीं की है। कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी जो निर्णय लेंगे उन्हें वह मंजूर होगा। 

चुनाव पूर्व कांग्रेस ने कमलनाथ को केंद्र से शिफ्ट कर एमपी कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा था। तब सिंधिया को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। जब राहुल गांधी ने कमलनाथ को प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित करने का ऐलान किया तो उन्होंने अपने ट्वीटर पर एक कहावत भी साझा कि थी। राहुल ने एक दोनों नेताओं के साथ एक फोटो शेयर कर टॉलस्टॉय के शब्दों में लिखा था कि दो सबसे ताकतवर योद्धा हैं- सब्र और समय। उनका इशारा था कि इस बार समय कमलनाथ का है और सिंधिया का थोड़ा और सब्र करना होगा। 

लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या राहुल सिंधिया को प्रदेश की कमान सौंपेंगे या फिर केंद्र में लोकसभा चुनाव के लिए उनका खास उपयोग किया जाएगा। लोकसभा चुनाव में छह महीने बचे हैं। राहुल गांधी सिंधिया को अपनी टीम का हिस्सा बनाना चाहते हैं। सूत्रों के मुताबिक हो सकता है अभी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमना भी न सौंपी जाए। 

जातिगत समीकरण की अहम भूमिका

इस बात पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि क्या कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए जाति संतुलन कार्ड खेलना चाहती है। भाज���ा ने तीन मुख्यमंत्री प्रदेश को दिए और तीनों ही ओबीसी वर्ग से आते हैं। उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान। प्रदेश में 57 फीसदी ओबीसी वोट बैंक है। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस जातिगत समिकरण बैठाने की जुगत में हैं। अगर कांग्रेस इस योजना पर काम करती है तो प्रदेश से कांग्रेस के दो बड़े ओबीसी नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव और पूर्व मंत्री रहे राम निवास रावत। यादव बुधनी से शिवराज के खिलाफ चुनाव लड़े और हार गए। पार्टी ने उन्होंने पूरे जोरशोर से अंजाम जानते हुए भी मैदान में उतारा था। वहीं, रावत प्रदेश की विजयपुर विधानसभा से हारे हैं। 

सूत्रों के मुताबिक, भाजपा की कमान एक ठाकुर नेता के हाथ में है। महाकौशल के नेता राकेश सिंह भाजपा का नेतृत्व कर रहे हैं। अगर ठाकुर कार्ड खेला जाता है तो पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह प्रदेश अध्यक्ष के लिए पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का नाम आगे बढ़ा सकते हैं। इस बार अजय सिंह चुरहट विधानसभा से हार गए हैं। लेकिन पूर्व में उन्होंने कांग्रेस की कमान बखूबी संभाली थी। उन्हें इसका फल मिल सकता है।