Six-reasons-why-Shivraj-factor-may-not-be-enough-for-BJP-fourth-straight-victory

भोपाल। मध्यप्रदेश में भाजपा लगातर तीन विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करती रही है। पार्टी को इस बार फिर जीत के लिए जनता पर पूरा भरोसा है। कई नेता ये दावा कर रहे हैं कि 2013 के मुकाबले इस बार बीजेपी प्रचंड बहुमत हासिल करेगी और चौथी बार सरकार बनाएगी। पिछले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस की जीत में महज आठ फीसदी का अंतर था। इस बार प्रदेश में भाजपा के खिलाफ विरोधी लहर है। इन हालातों में छह ऐसी वजह बीजेपी के चोथी बार सरकार बनाने के ख्वाब को तोड़ सकती हैं। हालांकि, कांग्रेस के लिए जीत की राह इतनी आसान नहीं है। 

पहला कारण, किसानों में भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी है। मंदसौर गोलीकांड के बाद उपजे किसान आंदोलन को पूर्व में सभी नेता देख चुके हैं। प्रशासन के द्वारा की गई फायरिंग में मारे गए किसानों और उनके परिवार के सदस्यों में इस बार गुस्सा है। खासतौर से मालवा निमाड़ क्षेत्र में। यह क्षेत्र किसानों का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। इस बार अगर किसानों की नाराजगी मतदान के समय निकली तो इसकी परिणाम कुछ और हो सकते हैं। हालांकि, डैमेज कंट्रोल करने के लिए सरकार ने किसानों से बिजली बिल माफ करने के लिए संबल योजना प्रदेशभर में लागू की है। इसे सरकार का बड़ा कदम माना जा रहा है। 

एससी एसटी वर्ग की नाराजगी

इस बार आदिवासी और एससी वर्ग भी बीजेपी से खफा है। प्रदेश के कई जिलों में भाजपा प्रत्याशियों का विरोध हो रहा है। बीजेपी ने 2013 के चुनाव में कई एससी सीट पर जीत हासिल की थी। लेकिन बीते दो साल में हालात बदल गए हैं। इस साल अप्रैल में हुए एससी एसटी एक्ट को वापस लेने के लिए विरोध प्रदर्शन में पुलिस ने दलित युवाओं को जमकर खदेड़ा था। जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुई थी। अब इसका खमियाजा बीजेपी को चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। ग्वालियर और चंबल क्षेत्र में दलितों में गुस्सा पनप रहा है। हालांकि, प्रदेश में 16 फीसदी दलित हैं। दलित वोट के ध्रुविकरण से भाजपा को बहुत अधिक नुकसान नहीं होगा। 

तीसरा कारण, भाजपा ने पिछले चुनाव में 47 एसटी सीट पर सानदार प्रदर्शन किया था। पिछले बार पार्टी को 32 आरक्षित सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इस बार कांग्रेस इन सीटों पर सेंध लगाने के लिए तैयार है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि उन्होंने पांच साल में आदिवासियों के बीच जाकर सरकार की नाकामियां गिनाईं हैं। प्रदेश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आदिवासी समुदाय का है। प्रदेश में 21 फीसदी आदिवासी मतदाता हैं। और कहा जाता है यह कांग्रेस के समर्थक हैं। लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां बाजी मारते हुए आदिवासी वोट बैंक अपनी ओर करने में कामयाबी हासिल की थी। अब, भाजपा को इन सीटों पर दो दर्जन अन्य निर्वाचन क्षेत्रों के अलावा वास्तव में अच्छा प्रदर्शन करने की जरूरत है, जहां एसटी मतदाताओं की पर्याप्त उपस्थिति है। फिलहाल, जनजातीय मतदाता बीजेपी के लिए ज्यादा उत्साही नहीं हैं।

चौथा, तीन बार की सरकार के बाद आखिरकार प्रदेश में विरोधी लहर दिखाई पड़ रही है। यह कोई और नहीं बल्की बीजेपी का आंतरिक सर्वे भी कह चुका है। ओपीनियन पोल में भी प्रदेश में भाजपा के खिलाफ विरोधी लहर का दावा किया जा रहा है। कई सालों से एमपी में बीजेपी की जीत का कारण शिवराज रहे हैं। बहरी लोग इस बात पर हैरान होते हैं कि डंपर घोटाला और व्यापमं घोटाला होने के बाद भी उनकी लोकप्रियता कैसे बरकरार है। हालांकि, यह स्थिति भी इस बार बदली है। अब शिवराज के भाषण जनता को प्रभावित करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। शिवराज लगातार जनता को लुभाने और मनाने के लिए रैली और जनसभाएं कर रहे हैं। उन्होंने जुलाई से ही इस काम को अंजाम देना शुरू कर दिया था। उन्होंने करीब प्रदेश की 200 सीटों पर जन आशीर्वाद यात्रा निकाली। और सियासी हल्कों में हलचल मचादी। वह लगातार जनका के बीच जाकर दिग्विजय सिंह के कार्यकाल को दोहराते हुए यह कह रहे हैं कि कैसे उन्होंने प्रदेश को काले अंधेरे से निकाल कर उजाले में किया है। कैसे उन्होंने बीमारू राज्य का दाग प्रदेश से हटाया है। 

पांचवा कारण है सवर्णों में नाराजगी। चौहान ने प्रमोशन में आरक्षण देने की वकालत की थी। विपक्ष ने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई थी। दो साल बाद यह मुद्दा व्यापक आंदोलन बनकर उभरा। सपाक्स ने प्रदेशभर में रैली कर सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी। जगह जगह मंत्रियों से लेकर विधायकों का विरोध हुआ। सवर्णों ने इस बार सरकार को सत्ता से बेदखल करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिन अब सपाक्स खुद ही चुनावी मैदान में है। 

अंतिम और छठा कारण है प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी और प्रदेश में उधोग लाने में सरकार की विफलता। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में अच्छी सड़क बनाने के भले दावे किए हों, लेकिन वह प्रदेश में रोजगार स्थापित करने में फेल साबित हुए हैं। उनके कार्यकाल में कई औद्योगिक शिखर सम्मेलनों का आयोजन हुआ। कुछ तो चांदी के बर्तन के इस्तेमाल के कारण भी चर्चा में आए। लेकिन सरकार को किसी भी औद्योगिक घराने से खास तवज्जो नहीं मिली। प्रदेश के युवाओं को बाहर जाकर रोजगार तलाश करना पड़ रहा है। जो एक बड़ी वजह है नाराजगी की।