‘कोरोना से जीत जाओ जब जंग, मत कहना देवदूत या महान हैं, बस इतना कह देना हम भी इंसान हैं’

भोपाल| कोरोना से जंग लड़ते हुए इंदौर के पुलिस अधिकारी देवेंद्र चंद्रवंशी की शनिवार रात को मौत हो गई। उनके निधन से पुलिस महकमा सदमे है, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कर्मवीर योद्धा के निधन पर दुःख जताते हुए सहायता का एलान किया है| अति.पुलिस महानिदेशक लोकायुक्त, पवन जैन ने कोरोना के ख़िलाफ़ जंग को समर्पित कुछ पंक्तियाँ लिखी है, जो दर्शाती है कि किस तरह लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान की परवाह किये बिना पुलिस जवान संकट काल में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं|

कोरोना से जीत जाओ जब जंग।
पा जाओ जब अपने पुराने जीवन रंग।
तब मत कहना कि हम कर्मवीर, देवदूत या महान हैं।
बस इतना कह देना कि हम भी इंसान हैं।

कोरोना से बचने, लॉकडाउन में जब आप घरों में बंद पड़े थे,
तब हम ख़ाकी पहन कर आपकी सुरक्षा के लिए गली , नुक्कड़ और चौराहों पर खड़े थे ।
किसी बीमार को अस्पताल पहुँचाने में,
या किसी ज़रूरतमंद को मदद दिलाने में,
किसी संक्रमित बस्ती को सील करवाने में,
या किसी की जान बचाने में,
सबसे पहले हम ही आगे बढ़े थे ।
हाँ हम ही तो वर्दी पहन पहली पंक्ति में खड़े थे।

लोगों को रोकने, टोकने और आइसोलेट करने में,
हमने लाठी, पत्थर और तलवारों के कितने वार सहे थे ।
किसने देखा था कि खाकी पर कितने रक्त बिंदु बहे थे।
पुलिस, डाक्टरों और सफ़ाई कर्मियों को छोड़ सभी तो इस जानलेवा महामारी से सहमें और डरे थे ।
मगर फिर भी हम ख़ाकी वाले
अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद खड़े थे- – – – !

बंद थे दफ़्तर, बंद दुकानें, शहर था बंद, सन्नाटा भारी था।
खुले थे बस थाने और अस्पताल, नाज़ुक वक़्त में भी हर मुश्किल मौक़े पर पहुँचा वर्दीधारी था।
लोगों में विश्वास जगाने घंटों गश्त लगाते थे।
वायरस से परिवार बचाने, हफ़्तों घर नहीं जाते थे ।
हमारे भी सैकड़ों साथी इस महामारी की चपेट में पड़े थे।
फिर भी हम ख़ाकी वाले वर्दी पहने अपने फ़र्ज़ पर अड़े थे – – – – !

भले न मुझे आता हो तैरना , किसी डूबते को बचाने दौड़ कर जाता हूँ।
झुलसे हैं दंगों में जब भी मेरी बस्ती के लोग,आग बुझाने का काम भी निभाता हूँ ।
महाकुंभो और मेलों की अथाह भीड़ में, भूले भटकों का रास्ता बन जाता हूँ।
बाढ़, भूकंप और आपदा के हर काल में, पीड़ितों को सबसे पहले ढाँढस बँधाता हूँ।
अपराधों की रोकथाम और हर लुटे पिटे की ख़ातिर, शातिर बदमाशों और लुटेरों
से बेख़ौफ़ लड़े थे।
कंट्रोल रूम से लेकर पुलिस थाने तक ये ख़ाकी वाले हर वक़्त हाज़िर खड़े थे- – – !

मुझे भी लगती है भूख और प्यास।
वाहनों के धुएँ से मेरी भी घुटती है श्वास ।
छुट्टीयों की हमको भी रहती है आस।
परिवार के साथ वक़्त बिताने की हमको है तलाश।
नींद और थकान मुझको भी सताती है।
सच बताऊं! नन्ही सी बेटी ड्यूटी पर बहुत याद आती है।
सड़क किनारे ही बैठ कर सुस्ताता हूँ,
भूखे और मजबूर को जब भी मैं पाता हूँ।
कभी अपने हिस्से का खाना भी खिलाता हूँ ।
काँटे , पत्थर, नफ़रत और गाली से ही बनती है मेरी हस्ती।
पुलिस की शहादत को करें नमन, हम भी ढूँढते है ऐसी बस्ती।
घनघोर अंधेरे में भी हम मशाल थाम कर आगे बढ़े हैं।
सुबह, शाम और रात की छोड़िए , कई- कई दिनों तक लगातार ड्यूटी पर हम ख़ाकी वाले अड़े हैं- – – – !

टूट जाता लॉक डाऊन का ही लॉक, ग़र हम थोड़ा भी डगमगाते।
फिर कैसे बेफ़िक्र होते बुजुर्ग और कैसे बच्चे मुस्कुराते।
यदि जन-जन का हौसला हम ख़ाकी वाले नहीं बढ़ाते।

कोरोना से जब जंग जीत जाओ , तब मत कहना कि हम कर्मवीर , देवदूत या महान हैं।
बस इतना कह देना कि हम भी इंसान हैं।
हाँ बस इतना कह देना कि हम भी इंसान हैं।।