धर्म, डेस्क रिपोर्ट। हिंदू सभ्यता की बात करें तो इसमें व्रत का एक अलग ही महत्व रहता है। ऐसा कहा जाता है की व्रत न केवल अंदर से तन को स्वच्छ करता है बल्कि मनुष्य के मन को मजबूत करने में मदद करता है। व्रत के द्वारा मनुष्य द्रणसंकल्पित होकर एकाग्रचित हो अपनी इंद्रियों तक को काबू में कर सकता है।

क्या है शुक्ल पक्ष की देवशयनि एकादशी का महत्व आइए जानें । 

हिंदू धर्म में अलग अलग तरह के व्रतों का वर्णन है जिनकी विधियां भी एक दूसरे से भिन्न होती हैं। मनुष्य अपनी इक्षा और कामना अनुसार इन व्रतों का पालन करता है।

क्या है देवशयनी एकादशी का व्रत और महत्व?

वैसे तो एकादशी का व्रत महीने में दो बार किया जाता है। पर जो सबसे महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती हैं वो है देवउठनी और देवशयनी एकादशी ।

आपको बता दें हिंदू मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में अपनी शेष शैया पर चिर निद्रा में चले जाते हैं जिसके बाद सभी हिंदू शुभ कार्यों एवं अनुष्ठानों को देवउठनी ग्यारस तक के लिए बंद कर दिया जाता है। कोई भी शुभ काम जैसे विवाह समोरह आदि देवउठनी ग्यारस के बाद ही प्रारंभ किए जाते हैं।

क्या है देवशयनी ग्यारस करने के नियम?

ऐसा कहा जाता है कि ग्यारस के दिन नीम की दातुन से दांत साफ करने चाहिए , बारह बार शुद्ध पानी से कुल्ला करना चाहिए , स्नान कर संभव हो तो गीता का पाठ करना चाहिए , भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करना चाहिए , साथ ही भगवान विष्णु के मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और फिर भगवान से अपनी और अपने परिवार के लिए प्रार्थना कर शक्ति प्रदान करने की विनती करना चाहिए और क्रोध न करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए। तुलसीदल का सेवन नहीं करना चाहिए , गोभी , शलजम , गाजर , पलक आदि सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए। भगवान की पूजा में चावलों का उपयोग पूर्णतः वर्जित हैै इसलिए पूजा करते समय चावल का स्पर्श करने से बचना चाहिए। यथा शक्ति दान पुण्य करना चाहिए , और हो सके तो रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु और उनके अवतारों का स्मरण करना चाहिए।

ऐसा कहा जाता है कि जो लोग सभी नियमों का पालन कर इस व्रत को पूरे मन और श्रद्धा से करते हैं यह व्रत उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्णं करता हैं और साथ ही जातक के सभी पापों का नाश भी करता है।