Reservation In Promotion : मंत्री समूह को भेजें जाएंगे सुझाव, प्रावधानों में हो पारदर्शिता

Reservation in promotion के नियमों की संवैधानिकता को लेकर स्वयं केंद्र एवम कई राज्यों के लगभग 133 प्रकरण कई वर्षों से लंबित हैं।

भोपाल, डेस्क रिपोर्ट। लम्बे समय से प्रमोशन में आरक्षण (reservation in promotion) लंबित मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने सुनवाई हुई। इस दौरान सभी राज्यों ने अपना अपना पक्ष रखा। जिसके बाद एमपी समेत सभी राज्यों को अपना पक्ष रखने के लिए 2 हफ्तों का समय दिया गया है। वहीँ अगली सुनवाई 5 अक्टूबर से शुरु होगी। इधर सुप्रीम कोर्ट नेने कहा कि कई वर्षों से मामला लंबित है, जिसके कारण कर्मचारियों (Government Employee) को प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है, ऐसे में अब आगे तारीख नहीं दी जा सकती।

इधर कोर्ट की सुनवाई के बाद सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था की प्रांतीय कार्यकारिणी की बैठक सुल्तानाबाद भोपाल में हुई। बैठक में सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित प्रकरण पर हुई सुनवाई और न्यायालय के आदेश के संदर्भ में विस्तृत चर्चा की गई। साथ ही मप्र सरकार द्वारा हाल ही में गठित मंत्री समूह की समिति को सुझाव प्रेषित करने के संबंध में विचार किया गया।

कल न्यायालय ने प्रकरणों पर अंतिम निर्णय के पूर्व ही यह बिलकुल स्पष्ट कर दिया है कि इंद्रा साहनी, एम नागराज और वर्ष 2018 में 5 न्यायधीशों की पीठ द्वारा निर्धारित मापदंडों के आधार पर ही फैसलों का निपटारा किया जाएगा। जाहिर है जो भी नियम इनकी पूर्ति नहीं करते वे असंवैधानिक हैं। मप्र के प्रकरण में पूर्व में ही मा उच्च न्यायालय में यह स्थापित हो चुका है कि पदोन्नति नियम एम नागराज प्रकरण में निर्धारित मापदंडों के अनुकूल नहीं हैं।

सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था के सचिव ने कहा कि सपाक्स का मानना है कि अब जबकि प्रकरण में अंतिम निर्णय आने में बामुश्किल 1 माह ही लगना है। अंतिम निर्णय के आदेशानुसार ही मंत्री समूह की अनुशंसाएं हों तो भविष्य में किसी भी विसंगति से बचा जा सकेगा। अन्यथा पुन: न्यायालयीन प्रकरणों का जन्म होगा और एक बार फिर सारी मेहनत व्यर्थ होगी। सपाक्स अपनी अपेक्षाओं और सुझावों को मा मंत्री समूह की समिति को प्रेषित कर निवेदन करेगा कि किसी भी स्थिति में नियमों में ऐसे प्रावधान न किए जाएं जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में निर्धारित मापदंडों का उल्लंघन करते हों।

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न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक दक्षता और क्रीमीलेयर की अवधारणा को समाहित करते हुए उचित व स्पष्ट प्रावधान नियमों में हों, ताकि कोई विसंगति उत्पन्न न हो। शासन नियमों को तैयार करने के पूर्व यह निर्धारित करे कि प्रत्येक स्तर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व किस प्रकार निश्चित होगा। व्यक्ति विशेष की पदोन्नति से प्रशासनिक दक्षता पर असर आंकने के मापदंड क्या होंगे और क्रीमी लेयर कैसे परिभाषित होगी।

सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था के सचिव ने कहा कि सपाक्स का सुझाव है कि महाराष्ट्र सरकार ने जिस तरह समिति गठित कर प्रतिनिधित्व के निर्धारण हेतु कार्यवाही की है। उसी तरह मप्र सरकार भी सभी विवादास्पद बिंदुओं पर स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारण हेतु समिति गठित कर मानक दिशा निर्देश जारी करे और उन्हें नियमों का हिस्सा बनावे। सपाक्स का यह भी मानना है कि ज्यादती और अन्याय सामान्य, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग के साथ हुई है और यह उच्च न्यायालय के निर्णय से स्थापित हो चुका है। अत: जिस प्रकार पदोन्नति संबंधी मामलों में अजाक्स प्रतिनिधि रखा जाता है। उसी तरह एक सपाक्स प्रतिनिधि भी अनिवार्यता रखा जावे।

उल्लेखनीय है कि पदोन्नति में आरक्षण के नियमों की संवैधानिकता को लेकर स्वयं केंद्र एवम कई राज्यों के लगभग 133 प्रकरण कई वर्षों से लंबित हैं। मप्र में भी वर्ष 2016 से ही पदोन्नतियां बंद है। उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 5 अक्तूबर से प्रकरण में निरंतर सुनवाई होगी। अत: अब अंतिम फैसला आने में अधिक समय नहीं है।