निदा फाजली, वह कलमकार जिसकी रगों में ग्वालियर की नई सड़क खून की जगह दौड़ती थी, आइए सुनें ऐसे ही कुछ मशहूर कवियों और कलमकारों को ममता तिवारी की जुबानी और जानें उनके कुछ अनजाने पहलुओं को

Amit Sengar
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Mamta Tiwari On Famous Poets : क्या होगा जब एक अबोध बालक से कहा जाए कि वह सृष्टि की संरचना का वर्णन करें, क्या होगा जब एक साहित्य के टीचर से गणित का कठिन सवाल पूछ लिया जाए, क्या होगा जब आम बोलचाल की भाषा वाले शख्स से मशहूर शायरों के शेर और कहानियों के मतलब पूछ लिया जाए। निश्चित तौर पर यह लोग इन सभी का अर्थ समझाने में असमर्थ महसूस करेंगे।

शायरियां और कहानियां हर उम्र के इंसान को पढ़ना और सुनना अच्छा लगता है। हर इंसान अपनी समझ और रुचि के हिसाब से शायर और कहानीकार को चुनता है और पढ़ता है। पर समस्या तब आती है जब वह पढ़ना तो एक बहुत मशहूर शायर को चाहता है लेकिन उस शायर की कही हुई बात उस इंसान के सर पर से निकल जाती है। लेकिन अगर हम आपसे कहे की एक ऐसी साहित्यकार और कहानीकार है जिन्होंने अब इस बेहद मुश्किल चीज को बेहद आसान कर दिया है तो आप क्या कहेंगे?

क्या कह रही है ज़िंदगी चैनल ने जोड़ा भूत को वर्तमान से

जी हम बात कर रहे हैं भोपाल में रहने वाली मशहूर साहित्यकार ममता तिवारी की। ममता ने लोगों की शायरों के प्रति मोहब्बत और शायरों की बात को न समझने वाली भावनाओं को न केवल समझा बल्कि कैसे शायर को आमजन तक पहुंचाया जाए इसका निराकरण भी किया। ममता अपने यूट्यूब चैनल “क्या कह रही है ज़िंदगी” के माध्यम से न केवल इन शायरों को अतीत से वर्तमान में लेकर आती हैं बल्कि इन सभी को आमजन से जोड़ती भी है। वह अपनी बातों में अपने किस्सों में अपनी कहानियों में इन शायरों की जिंदगी से जुड़े वह अनसुने पहलुओं को आमजन तक पहुंचाती हैं जिन्हें पहले बहुत ही कम लोग जान और समझ पाए हैं। सुनो किताबें कुछ कहती हैं मैं ममता न केवल दिलचस्प किस्सों को लोगों के साथ साझा करती हैं बल्कि कहानीकारों और शायरों की जिंदगी से जुड़े पहलुओं को भी लोगों तक पहुंचाती हैं।

खुद लिख चुकी हैं कई किताबें

गौर करने वाली बात यह है कि शायरों और कहानीकारों को आमजन से रूबरू करातीं ममता अपने आप में भी एक बेहतरीन लेखक हैं जो कई पुस्तकें लिख चुकी हैं। इन पुस्तकों में मुख्य ‘क्या कह रही है जिंदगी(2010) प्रथम संस्करण, क्या कह रही है जिंदगी(2011) द्वितीय संस्करण, कहकशां(2012), चुभती दोपहर(2013), रेशमी ख़्वाब मखमली रातें(2013), यूँ भी कभी कभी(2013) प्रथम संस्करण, यूँ भी कभी कभी(2018) द्वितीय संस्करण, सरगोशियाँ(2018), पीले पत्ते(2019), रफूगरी (2022) आदि मुख्य किताबें हैं।

निदा फाजली, वह कलमकार जिसकी रगों में ग्वालियर की नई सड़क खून की जगह दौड़ती थी, आइए सुनें ऐसे ही कुछ मशहूर कवियों और कलमकारों को ममता तिवारी की जुबानी और जानें उनके कुछ अनजाने पहलुओं को

सामान्य रही शुरुआती जिंदगी

1963 में मध्यप्रदेश के नरसिंहगढ़ में जन्मी ममता ने रसायन शास्त्र में अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी की। उन्होंने कॉलेज के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन शुरू किया उसके बाद समाचार पत्र “सुबह सवेरे”, मासिक पत्रिका “समीरा” जैसी जानी मानी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में उन्होंने काम किया। कभी आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारण तो कभी निशक्त गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करना ममता के जीवन का एक अहम हिस्सा रहा है। 11वीं हिंदी सम्मेलन में ममता ने हिंदी का परिचय मॉरीशस में जाकर लहराया।

निदा फाजली, वह कलमकार जिसकी रगों में ग्वालियर की नई सड़क खून की जगह दौड़ती थी, आइए सुनें ऐसे ही कुछ मशहूर कवियों और कलमकारों को ममता तिवारी की जुबानी और जानें उनके कुछ अनजाने पहलुओं को

कई सम्मानों से हैं सम्मानित

इनके बेहतरीन कार्य और निष्ठा के लिए इन्हें कई सम्मानों से नवाजा भी गया है। 2008 में करवट कला परिषद भोपाल द्वारा ‘अभिव्यक्ति सम्मान’ 2011-12 में कला मंदिर भोपाल द्वारा ‘माहेश्वरी कृति पुरस्कार पुरस्कार’, 2012 में श्रीमती सुमन चतुर्वेदी स्मृति भोपाल द्वारा ‘श्रेष्ठ साधना सम्मान’ 2014 में कादंबिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण समिति भोपाल द्वारा ‘कादंबिनी वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान समाज सेवा’ से इन्हें नवाजा जा चुका है।


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मुझे अपने आप पर गर्व है कि में एक पत्रकार हूँ। क्योंकि पत्रकार होना अपने आप में कलाकार, चिंतक, लेखक या जन-हित में काम करने वाले वकील जैसा होता है। पत्रकार कोई कारोबारी, व्यापारी या राजनेता नहीं होता है वह व्यापक जनता की भलाई के सरोकारों से संचालित होता है। वहीं हेनरी ल्यूस ने कहा है कि “मैं जर्नलिस्ट बना ताकि दुनिया के दिल के अधिक करीब रहूं।”

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