परीक्षा अस्तित्व की लड़ाई नहीं सीढ़ी भर है, अपने सपनों का बोझ मासूमों पर न डालें

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भोपाल। मध्य प्रदेश में परीक्षाएं का समय बहुत नजदीक है। ऐसे में बच्चे तनाव के साथ साथ कई मानसिक दबाव से भी जूझते हैं। परीक्षाओं के दौरान उनकों कैसे बेहतर महसूस कराया जाए और एक तनाव मुक्त वातावरण दिया जाए। इसको लेकर देवाल कलेक्टर डॉ. श्रीकांत पाण्डेय ने एक पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने बहुत खूबसूरती से इस बात को बताया है कि कैसे अभिभावक अपने बच्चों को समझें और उनको तनावमुक्त माहौल परीक्षाओं के दौरान दें। 

प्रिय अभिभावक,

आप जानते हैं कि स्कूली बच्चों की परीक्षाएं सर पर हैं। बच्चे जी जान से परीक्षा की तैयारी में जुटे हुए हैं। पूरा परिवार इन दिनों कुछ अधिक ही अनुशासित हो जाता है। यही अतिरिक्त अनुशासन धीरे-धीरे तनाव का घेरा भी बनाने लगता है। लेकिन आप सबसे मेरा विनम्र आग्रह है कि बच्चों की इन परीक्षाओं को परीक्षाओं की तरह ही लीजिए। ये उनके भविष्य या अस्तित्व की लड़ाई कतई नहीं है, एक सीढ़ी-भर है। अपने सपनों का बोझ अपने मासूम बच्चों पर मत डालिए। परिणामों और अंकों के गणित में उन्हें बेवजह मत उलझाइए। उन्हें उनके हिस्से की पूरी नींद लेने दीजिए, तभी वे उनमुक्त भाव से परीक्षआएं दे सकेंगे। 

आप कृपया उन्हें बताइए कि जो बच्चे आईआईटी में, सेंट स्टीफंस, लेडी श्रीराम कॉलेज या किसी अन्य प्रतिष्ठित संस्था में प्रवेश नहीं पा सके, उन्होंने भी आगे चलकर जीवन में नाम कमाया है। केवल मुठ्ठी भर संस्थाएं भारत का भविष्य नहीं बनाती। हर बच्चा देश का भविष्य गढ़ता है। उन्हें यह भी बताइए कि सचिन तेंदुलकर के पिता प्रोफेसर थे। वे चाहते तो सचिन का बल्ला पैड घर के एक कोने में पटकवा देते, लेकिन उन्होंने उसे उसके हिस्से का आकाश दिया। उसके सपनों को पहचाना, और उसके मनचाहे क्षेत्र में उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया। आज कोई सचिन की अंकसूची नहीं जानता, लेकिन रनों का विशालकाय पर्तव बनाकर सचिन ने पूरी दुनाया में भारत का नाम रोशन किया। सचिन को गणित या विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षकों की किसी को याद नहीं, लेकिन जीवन और क्रिकेट के गुर उसे सिखाने वाले रमाकांत आचरेकर को हर देशवासी प्रणाम करता है। अपने बच्चों में छुपे संकेतों को आपसे बेहतर कोई नहीं पढ़ सकता। क्या पता जिसे आप डॉक्टर बनान चाहते हों, वह कल का कोई मूर्धन्य विचारक हो। जिसे आप इंजीनियर देखना चाहते हैं, वह कल का कोई प्रख्यात खिलाड़ी हो। जिसे आप पैतृक व्यवसाय में खपाना चाहते हों, वह आने वाले दिनों में उच्च प्रशासनिक अफसर बने। 

आगर आपकी बेटी या बेटा खिड़की के बाहर कबूतरों की फड़फड़ाहट देखकर, पतंगे देखकर, तितली देखकर खिलखिला उठता है, तो उसे डांट डपटकर किताब उठाने को कभी मत कहिए। उसे किताबों का डर मत दिखाइए, उसे किताबों से प्यार करना सिखाइए। सच तो यह है कि दसवीं या बारहवीं की परीक्षा की अंकसूची केवल हमारी जन् तिथि प्रमाणित करती है, हमारी प्रतिभा नहीं। प्रतिभाएं कभी अंकों की परिधि में कैद नहीं होतीं। अगर आप अच्छे अभिभावक हैं, तो अपने बच्चों को अच्छे और बुरे का अंतर सिखाइए। रिश्तों की अहमियत बताइए। उन्हें निडर बनाइए गलत वे विरुध्द खड़े होने का उन्हें साहस दीजिए। बाकी के रास्ते वे खुद ही चुन लेंगे। उन्हें रट्टा मारना नहीं, विचार करना और तर्क देना सिखाइए। उन्हें यह भी बताइए कि डिग्री का महत्व तो है, लेकिन केवल डिग्री कभी महत्वपूर्ण नहीं होती। उन्हें यह भी समझाइए कि बाहर से जंगल का कोई रास्ता कभी नजर नहीं आता, लेकिन एक बार जंगल में प्रविष्ट हो जाओ, तो तमाम पगडंडिया दिखाई देने लगती है। जीवन भी कुछ इसी जंगल की तरह है।

आप उन्हें प्रतिस्पर्धा का महत्व समझाइए। समझाइए कि हर व्यक्ति के हिस्से में पारजय के आगे जीत रखी होती है। उन्हें बताइए कि अक्सर ठोकर खाकर ही संभलने का हुनर आता है। किसी भी परीक्षा में उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होना कभी नहीं होता है। जीवन में बिना असफल हुए कभी सफलता नहीं मिलती, किसको नहीं मिली, यह भी उन्हें बताइए। उन्हें बताइए कि मुल्कराज आनंन ने जब अपने उपन्यास कुली की पाणडुलिपि प्रकाशन के लिए भेजी थी, तो लगातार 18 प्रकाशकों ने कूड़ा कहकर उसे छापने से साफ इनकार कर दिया था। और जब 19वें प्रकाशक ने उसे छापा, तो उसकी भूमिका मूर्धन्य विद्वान ई एस फॉस्टर ने लिखी थी। मुल्कराज आनंन को इसी एक कृति ने रातों-रात विश्वख्याति प्रदान की थी। जाहिर है कि उनको सफलता केवल इसलिए मिली कि अपने लिखे पर उन्हें पूरा भरोसा था, साथ ही 18 असफलताएं झेलने की हिम्मत उनके पास थी।