क्या “महाराज” को रोकने में सफल होगा कांग्रेस का PK फॉर्मूला ?

ग्वालियर।अतुल सक्सेना। कुर्सी का मोह और वो भी ऐसी कुर्सी जिसका सपना कई दशकों से आँखों में बसा हो और यदि ये सपना चंद महीनों में ही चकनाचूर हो जाए तो इंसान बदला लेने के लिए हर तरकीब अपनाता है। प्रत्यक्ष युद्ध में हथियार इसका उत्तर देते हैं लेकिन परोक्ष रूप में रणनीति इसका जवाब देते हैं। राजनीति भी युद्ध का ही एक रूप है जिसमें हर चाल रणनीति के हिसाब से चली जाती है और उपचुनाव में कांग्रेस भी ऐसी ही रणनीति बना रही है। इसीलिए कांग्रेस ने उपचुनाव के प्रशांत किशोर जैसे बड़े रणनीतिकार को जिम्मेदारी सौंपी है। यानि कांग्रेस ने “महाराज” को घेरने के लिए Pk फार्मूला तैयार किया है।

मध्यप्रदेश में 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव प्रस्तावित हैं। कांग्रेस हर हाल में अधिक से अधिक सीटें जीतकर सत्ता में वापसी करना चाहती है। खास बात ये है कि पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ इस बार पूरी कमान अपने हाथ में रखना चाहते हैं । इसीलिए वे उपचुनाव को हल्के में नहीं ले रहे। दिग्विजय सिंह पर भरोसा कर सत्ता खोने वाले कमलनाथ इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहते इसलिए उन्होंने देश की तीन बड़ी रणनीतिकार कंपनियों से संपर्क किया और आखिर में प्रशांत किशोर यानि Pk को चुना और उन्हें प्रदेश की 24 सीटों में जीत दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी है। हालांकि अभी ये खुलासा नहीं हो पाया है कि कांग्रेस ने प्रशांत किशोर से ये डील कितने में की है लेकिन राजनैतिक पंडित इसे करोड़ों का सौदा बता रहे हैं।

ग्वालियर चंबल की 16 सीटें हैं महत्वपूर्ण

हालांकि चुनाव 24 सीटों पर होना है लेकिन इसमें ग्वालियर चंबल संभाग की 16 सीटों का बड़ा रोल है। 22 विधायक जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में गए हैं वो सभी सिंधिया समर्थक हैं लेकिन ग्वालियर चंबल अंचल सिंधिया का गढ़ है इसलिए कांग्रेस का यहाँ मुकाबला भाजपा के साथ सिंधिया से भी है। ये भी जग जाहिर है कि ग्वालियर चंबल में कांग्रेस नहीं सिंधिया कांग्रेस का दबदबा रहा है । पिछले लगभग सभी चुनावों की बात की जाए तो ग्वालियर चंबल अंचल में टिकट वितरण में हमेशा सिंधिया की ही चली यानि सिंधिया ने जिसे चाहा कांग्रेस हाई कमान ने उसे ही टिकट दिया और उसने जीत दर्ज की। 2018 का मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव सिंधिया के चेहरे की ताकत और प्रभाव का बड़ा उदाहरण है जिसने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया। अब समझा जा सकता है कि जब प्रदेश की जनता ने सिंधिया को नेता मानते हुए कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया तो फिर ग्वालियर चंबल अंचल तो सिंधिया का घर और गढ़ है। सिंधिया के प्रति भरोसे का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि उनके एक इशारे पर 22 विधायक जिनमें 6 कैबिनेट मंत्री थे सरकार छोड़कर आ गए। समझना होगा कि मंत्री पद और विधायकी त्यागना बड़ी बात होता है। यहाँ उन 10 विधायकों के बारे में चर्चा जरूरी है जो पहली बार विधानसभा पहुँचे थे लेकिन अपने “महाराज” की आज्ञा के सामने उन्होंने अपना राजनैतिक भविष्य शुरू करने से पहले ही दांव पर लगा दिया। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि Pk यानि प्रशांत किशोर ग्वालियर चंबल की 16 सीटों सहित इन 22 सीटों के लिए क्या रणनीति बनाते हैं और क्या उनकी रणनीति “महाराज” और “शिवराज” की जोड़ी को परास्त कर पायेगी।

क्यों चर्चा में रहते हैं प्रशांत किशोर यानि PK

प्रशांत किशोर अपनी पिछली कुछ परफॉर्मेंस के कारण बड़े रणनीतिकारों में गिने जाने लगे हैं । कहा जाता है कि 2014 में नरेंद्र मोदी ने जो जीत दर्ज की थी उसके पीछे प्रशांत किशोर थे। बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी को सत्ता तक पहुंचाने में प्रशांत किशोर की कुशल रणनीति कारगर साबित हुई। सबसे ताजा उदाहरण दिल्ली का हालिया विधानसभा चुनाव हैं जिसमें आम आदमी पार्टी को एक बार फिर सत्ता दिलाकर प्रशांत किशोर ने टीवी सर्वे और राजनैतिक पंडितों को शिकस्त दी थी। अब मप्र में उप चुनाव में कांग्रेस प्रशांत किशोर यानि Pk की सेवाएं ले रही है। देखना ये होगा कि प्रशांत किशोर और उनकी टीम ओन प्रदर्शन को जारी रखते हुए कांग्रेस को वापस सत्ता दिलाती है या सिंधिया का जादू जनता पर चलता है और “महाराज” एवं “शिवराज” की जोड़ी जीत का परचम लहराती है।