उमरिया पुलिस का मानवीय चेहरा, साल भर से 250 बेसहारा बुजुर्गों का जिम्मा उठाया

उमरिया, बृजेश श्रीवास्तव। छवि बदलने की कवायद से जूझ रही पुलिस व्यवस्था के सामने जिला पुलिस उमरिया ने एक नायाब नजीर पेश की है। पुलिस द्वारा पिछले एक साल से जिले के चिन्हित 250 जरूरतमंद बेसहारा बुजुर्गों के घर तक खाने पीने की चीजें और जरूरी दवाइयां पहुंचाने का काम किया जा रहा है। पिछले लॉकडाउन से शुरू सेवा का ये संकल्प अब तक अनवरत जारी है और इसके लिए पुलिस विभाग के अधिकारी कर्मचारी व्यक्तिगत स्तर पर भी आर्थिक सहायता के लिए आगे आ रहे हैं।

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उमरिया पुलिस का मानवीय चेहरा, साल भर से 250 बेसहारा बुजुर्गों का जिम्मा उठाया

पुलिस अधीक्षक विकास शाहवाल ने बताया कि कोविड-19 के पहले लॉकडाउन के समय तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा ने निराश्रित बुजुर्गों की मदद के लिए संकल्प अभियान की शुरूआत किया था। लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद जब हमने संकल्प अभियान की समीक्षा की तो पाया कि यदि संकल्प अभियान बन्द किया गया तो हितग्राही बुजुर्गों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति निर्मित होगी और उनके लिए जीवनयापन मुश्किल हो जाएगा। इसलिए हमने अपने स्टाफ से बातचीत कर इसे जारी रखने का फैसला किया। उन्होने बताया कि लगभग एक साल बाद कोरोना की दूसरी लहर की चपेट में आने के कारण लागू कोरोना कर्फ्यू की वजह से संकल्प अभियान का दायरा बढ़ाने का दबाव निर्मित हुआ और हमने दानदाताओं की मदद से न सिर्फ उसका विस्तार किया बल्कि बुजुर्गों के अलावा एनिमिक गर्भवती और धात्री माताओं को भी तत्काक्लिक रूप से इसमें शामिल कर उन्हें मदद भी पहुंचाई।

कैसे हुई संकल्प अभियान की शुरुआत
कोविड-19 के पहले लॉकडाउन के समय जिला पुलिस के संकल्प अभियान की शुरुआत हुई। जैसा कि हम जानते हैं पहला लॉकडाउन बहुत सख्त था। आवागमन, उद्योग, व्यापार, बाजार सब बन्द थे। पुलिस कड़ाई से लॉक डाउन का परिपालन सुनिश्चित कराने में जुटी थी। उस समय उमरिया में पदस्थ पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा जो अब छतरपुर के एसपी हैं, को फीडबैक मिला कि कई बुजुर्ग ऐसे हैं जिन्हें हर महीने जीवन रक्षक दवाइयों की आवश्यकता होती है। लेकिन उनके पास न आने-जाने का कोई साधन है, न उनकी सेहत ऐसी है कि वे खुद से कहीं आ जा सकें और ना दवाई लाने पहुंचाने वाला कोई हरकारा ही उनके पास है। तब उन्होंने तय किया कि जिला पुलिस ऐसे जरूरतमंद बुजुर्गों के घर जाकर उनसे दवा की पर्ची और पैसे लेकर दवा खरीद कर उन्हें पहुंचाने का काम करेगी। पुलिस के लोग जब बुजुर्गों के घर पहुंचे तो उनकी आंखें फटी रह गईं। इनमें से कई बुजुर्गों के हालात बद-से-बदतर थे। उनके पास ना राशन था, न दवाइयां, न खरीदने के लिए पैसे। खुली आंखों से बुजुर्गों की यह दयनीय स्थिति देखकर पुलिस बहुत असमंजस में थी। पुलिस उन्हें उनके हाल पर छोड़ नही सकती थी और उमरिया में वृद्धाश्रम या अन्य कोई ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद नही थी जो बुजुर्गों को सहारा दे सके। लिहाजा तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा ने तय किया कि ऐसे चिन्हित बेसहारा बुजुर्गों के लिए खाने पीने की आवश्यक वस्तुएं और दवाइयां उन तक पहुंचाने की व्यवस्था जिला पुलिस की ओर से की जाएगी। यहीं से शुरू हुआ जिला पुलिस का संकल्प अभियान जो अनवरत जारी है। पहले इसमें संख्या कम थी , जो अब बढ़ते बढ़ते 250 तक पहुंच गई है।

बढ़ता जा रहा अभियान का दायरा
पहले लॉकडाउन की समाप्ति और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा के स्थानांतरण के बाद संकल्प अभियान के सामने सवाल था अब आगे क्या? लेकिन मौजूदा पुलिस अधीक्षक विकास शाहवाल ने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए इस अभियान को न सिर्फ जारी रखा अपितु उसे विस्तारित भी किया। उनकी कोशिशों का परिणाम है कि संकल्प अभियान के तहत अब 250 बेसहारा बुजुर्गों को मदद पहुंचाई जा रही है। पुलिस अधीक्षक शाहवाल का कहना है कि पीड़ित मानवता की सेवा का इससे बेहतर विकल्प दूसरा क्या होगा। आपने बताया कि हम संकल्प अभियान का दायरा बढ़ाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। कोरोना कर्फ्यू के दौरान हमने बिड़ला सीमेंट की कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी के सौजन्य से दस्तक परियोजना के साथ मिलकर आकाशकोट के 25 गांवों की 350 गर्भवती एवं धात्री महिलाओं को पोषण आहार, मास्क और दवाइयां वितरित करने का काम किया है। इसी क्षेत्र के बेसहारा बुजुर्गों का सर्वे किया जा रहा है, सर्वे पूरा होने के बाद इस क्षेत्र के चिन्हित बुजुर्गों को भी संकल्प अभियान में शामिल कर मदद पहुंचाई जाएगी।

अभियान का असली कार्यकर्ता
जिला पुलिस के संकल्प अभियान का असली दारोमदार पुलिस अधीक्षक के स्टेनो देवा माने के कंधों पर है। जब से संकल्प अभियान की शुरुआत हुई है वह बिना किसी नागा, बिना किसी गफलत के उसे अपना व्रत मानकर निभा रहे हैं। कई बार ऐसी स्थितियां भी आई जब समय पर बुजुर्गों को देने के लिए सामग्री का बंदोबस्त नहीं हो पाया, तब देवा माने ने आगे बढ़कर उस परिस्थिति को संभाला और अपने वेतन से उस कमी को पूरा किया। उनकी इसी प्रतिबद्धता का परिणाम है कि संकल्प अभियान एक साल से लगातार गतिमान है। संकल्प अभियान को लेकर यूं तो कई तरह के अनुभव सुनने को मिलेते हैं, किंतु एक अत्यंत प्रेरक घटना पुराने एसपी सचिन शर्मा के रिलीव होने के ऐन पूर्व की है जिसका जिक्र करना प्रासंगिक होगा। बताया गया कि संकल्प अभियान को चलाने में देवा माने के व्यक्तिगत तीस हजार रुपये खर्च हो गए हैं। इसपर पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा ने देवा माने को बुलाकर शाबाशी के साथ पचास हजार रुपये पकड़ाये और कहा अच्छाई का ये सिलसिला रुकने नहीं देना। देवा माने का कहना है कि वे खुश थे और निश्चिंत भी क्योंकि संकल्प अभियान को आगे चलाने के लिए फिलहाल उनके पास पचास हजार कैश इन हैंड थे।

कहां से जुटते हैं संसाधन
किसी भी अभियान को चलाने के लिए सोच, कार्यकर्ता और संसाधनों का होना अत्यंत आवश्यक होता है। संकल्प अभियान के संचालन की शुरआत विभागीय कॉन्ट्रीव्यूशन से हुई। पुलिस अधीक्षक से लेकर थाने के स्टाफ तक ने खुशी खुशी अपना अंशदान दिया, लेकिन संख्या बढ़ने के कारण विभागीय अंशदान नाकाफी साबित होने पर जिले के व्यापारी और दानदाता मदद के लिए आगे आये हैं। संकल्प अभियान के एक मददगार बिड़ला सीमेंट की कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी के प्रोपराइटर विनोद आहूजा का कहना है कि दानदाता बस इतना ही चाहता है कि उसके द्वारा दी गई सहायता सही जगह पर सही ढंग से खर्च हो। उनका कहना है कि यह सबसे पुनीत और सबसे ज्यादा सुकून देने वाला काम है। इसीलिए संकल्प अभियान में सहायक बनकर हम गौरवान्वित भी हैं और आनंदित भी। इसके लिए हम जिला पुलिस के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमें इस अभियान से जुड़ने का मौका दिया।