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आखिरकार बिक गया 'किशोर दा' की यादों का 'महल'

खंडवा| सुशील विधानी| आखिरकार अशोक कुमार, अनूप कुमार, किशोर कुमार का पैतृक मकान गांगुली भवन बिक ही गया | सुपरस्टार ने अपने जीवन काल में अपनी फिल्मों में खंडवा का नाम दूध जलेबी के किस्से कई गानों में सुनाया, वह खंडवा आकर ही अपना आखिरी समय बिताना चाहते थे, जिस मकान में उनका बचपन निकला है कभी हम लोग भी इतराते थे कभी अपनी धरोहर पर की हम किशोर दा के शहर खंडवा के रहवासी है। कभी माखनलाल चतुर्वेदी की एक भारतीय आत्मा वाली शख़्सियत पर भी गुमान था हमे। वो भी बिक गई, अब वहां बाजार खड़ा है। कॉम्प्लेक्स जैसा। यह हमारी उपलब्धि है। किशोर कुमार का पुस्तैनी घर का भी सौदा हो गया। यहाँ भी मॉल खड़ा हो जाएगा। कुछ ही साल में। 

यकीनन ये अधिकार किशोर के परिजनों का था कि बंगले का चाहे जो करे, मगर सरकार काश इसे बचा लेती तो आंखे नीचे नहीं होती। ये महज मकान का सौदा नही है बल्कि सिने सुपर स्टार अशोक कुमार दादा मुनि, आवाज की दुनिया के बादशाह किशोर कुमार और अनूप दा के सपनो का सौदा है। खण्डवा से बेइंतहा मुहब्बत करने वाला किशोर कुमार 80 के दशक में किशोर नाईट करके लाखों रुपया दे गये कि मेरे बाबा और माँ के नाम कुछ बना लो ताकि वो अमर हो जाये। खण्डवा उन्हें याद रखे...उसी खंडवा ने उसकी यादों का भाव लगा दिया। उसके नाम पर इठलाने वाले, नाचने झूमने वाले खामोश हो गए और उस आंगन की कीमत लग गई जिसने इस शहर को दुनिया में पहचान दी। आज मुम्बई की मायानगरी के सितारे खण्डवा आते है और किशोर दा की समाधि देखते है तो कहते है कि इतना सम्मान आजतक किसी कलाकार को नही मिला। आज उसी का पुस्तैनी घर बिक रहा है। इससे बड़ी शर्म और दुखद खबर क्या होगी ? कभी सागर के विट्ठलभाई पटेल ने एक एक रुपए इकठा किया था ताकि धरोहर को संवारा जा सके मगर ये क्या हमने तो धरोहर ही तोल दी ? 

किसानों का प्याज खरीदकर हजारो करोड़ रुपया सड़ा देने वाली मध्यप्रदेश की सरकार अर्जुनदास को 15 करोड़ रुपए नही दे सकती ? सिर्फ इसलिए क्योकि इससे वोटो की फसल नही काट पाएंगे। सरकार की भी क्या गलती, उसके शहर के लोगो ने कभी अपने आकाओं को झकझोरा ही नही। काश ये शहर अपने जिंदा होने की खबर देता और अपने जनप्रतिनिधयों को जागता तो 15 क्या 25 करोड़ शिवराज सरकार को देना पड़े। आखिर माखनलाल जी के बाद किशोर दा के घर का यू बिक जाना खण्डवा की धरोहर के हाथ से कोहिनूर का फिसल जाना है। 

सवाल इस बात का नही की खरीददार कौन है? सवाल यह भी नही गंगोली परिवार का हक और अनूप कुमार के बेटे अर्जुनदास की हालत क्या है? सवाल सिर्फ हमारी कर की राशि का बेजा इस्तेमाल करने वालो से है की प्याज समझकर ही खरीद लेते और इसे गीत संगीत के दीवानों का म्यूजियम बना लेते तो किशोर दा के नाम पर मध्यप्रदेश की सरकार को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिल जाती जो शायद करोड़ो लगाने के बाद भी हनुमंतिया में नही मिल पाई।



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