108 साल पुराने इस स्कूल में हिंदी सीखने आते हैं विदेशी

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अंग्रेज़ी हमारे यहां भाषा नहीं, स्टेटस सिंबल है। अगर आप बढ़िया अंग्रेज़ी बोलते हैं तो लोग आपको अलग ही सम्मान की नज़र से देखते हैं। हालांकि ये कोई बुरी बात नहीं, किसी भी भाषा का ज्ञान होना व्यक्ति को समृद्ध ही करता है। लेकिन अफसोस की बात ये है कि अंग्रेज़ी की होड़ में हम हिंदी को कई बार हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। जहां हिंदी भाषी होने का गर्व होना चाहिए, वहीं हम इसे कमज़ोरी मान बैठते हैं। लेकिन इसी मानसिकता के बीच ऐसे लोग भी हैं जो दूसरे देशों से हमारे यहां सिर्फ हिंदी सीखने आते हैं।

आपको उत्तराखंड में मसूरी के पास बसे लैंडोर के भाषा स्कूल में कई विदेशी दिख जाएंगे। गाना गाकर हिंदी सिखाने वाला यह देश का सबसे पुराना (लगभग 108 साल) अनोखा भाषा स्कूल है। यहां हर साल लगभग 200 विदेशी हिंदी सीखने आते हैं। हिंदी के साथ यहां पंजाबी, उर्दू, संस्कृत और गढ़वाली भाषा भी सिखाई जाती है लेकिन इनमें सबसे ज़्यादा लोग हिंदी सीखने वाले ही होते हैं। इस स्कूल की नींव अंग्रेजों ने मिशनरीज के लिए डाली थी लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद भी यहां कई साल तक सिर्फ मिशनरीज को ही दाखिला दिया जाता था। फिर वक्त के साथ स्थितियां बदली और अब इस स्कूल का संचालन एक बोर्ड करता है। यहां हिंदी भाषा सीखने आने वालों में शोधकर्ता, दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी, राजदूत और फिल्मी सितारे तक शामिल होते हैं। इस स्कूल में दाखिला लेने वालों की उम्र 18 से लेकर 90 साल तक है और सबसे ज्यादा हिंदी सीखने वाले अमेरिका से आते हैं।

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