साल भर पहले इस IPS ने बयां की थी पुलिसकर्मियों की पीड़ा

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भोपाल|  जन-जन की सुरक्षा करने वाली और लोगों की परेशानी सुलझाने वाली पुलिस की भी अपनी परेशानी है, दिन रात ड्यूटी पर मौजूद रहने वाले पुलिस कर्मियों को एक छुट्टी मिलना भी मुश्किल होता यही पीड़ा पुलिस के हर परिवार को रहती है कि ख़ास मौके पर भी उनके परिवार के मुखिया उनके बीच नहीं होते| सरकारें बदलती रही, व्यवस्थाएं बदलती रही लेकिन पुलिस की यह पीड़ा दूर न हो सकी, अब चुनावी समय में कांग्रेस ने पुलिस कर्मियों के लिए बड़े ऐलान किये हैं, जिसमे साप्ताहिक अवकास भी शामिल हैं, साथ ही अन्य सुख सुविधा भी देने का वादा किया गया है| लम्बे समय से पुलिस परिवार इन सुविधाओं की मांग कर रहे हैं| वहीं कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भी पुलिस की पीड़ा को सामने रखा है| इन्ही में से एक हैं प्रदेश के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और  एडीजी प्लानिंग पवन जैन, जिन्होंने साल भर पहले 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस पर पुलिस की पीड़ा जाहिर की थी और बताया था कि पूरी दुनिया में पुलिस को इंसान समझा जाता है लेकिन देश में पुलिस को इंसान नहीं समझा जाता है|  पुलिस के भी मानव अधिकार  होते है, यह समझा जाना चाहिए| 

सीनियर आईपीएस और जाने माने कवी पवन जैन ने व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़े करते हुए अपनी पीड़ा एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल से बातचीत में बयां की थी, उन्होंने कहा कि उनका यह मानना है कि मानवाधिकार इंसानों के लिए होते हैं, चाहे वो अभिव्यक्ति का अधिकार हो शिक्षा का अधिकार हो या स्वास्थ का अधिकार हो, एक आदर और सम्मान के साथ जीने का अधिकार हो उतना अधिकार हर पुलिस वालों के लिए भी होना चाहिए| उन्होंने कहा पूरी दुनिया में पुलिस को इंसान समझा जाता है, लेकिन तीस साल की नौकरी के बाद मेरे अंदर यह पीड़ा है कि हिंदुस्तान में शायद पुलिस वालों को इंसान नहीं समझा जाता| उन्होंने कहा यूरोप और अमेरिका जैसे देश में पुलिसकर्मियों के काम के घंटे निश्चित हैं, एक सप्ताह में 40 घंटे तक काम किया जाता है, हर सप्ताह में दो या तीन दिन उन्हें अवकाश दिया जाता है, क्यूंकि वो विषम परिस्थितियों में काम करते हैं| वहीं हिन्दुस्तान में पुलिसवाले सप्ताह में 90 से 120 घंटे तक काम करते हैं, और अवकाश की बात की जाए तो सप्ताह दो दूर की बात है महीनों में भी कोई अवकाश नहीं मिलता| आईपीएस अधिकारी ने कहा कि यह निश्चित रूप से सोचने का विषय है कि एक व्यक्ति की सीमा होती है, वो कितने घंटे तक अच्छी ड्यूटी कर सकता है| 

वरिष्ठ आईपीएस ने बताया कि जब वो कविता पाठ के लिए इंग्लैंड गए थे और वहां से यूरोप भी गए जहां देखने को मिला कि वहाँ के अधिकाँश थाने सुबह दो-तीन घंटे और दोपहर के बाद दो घंटे के लिए खुलते हैं| वहीं हिन्दुस्तान के थानों के नसीब में ताले नहीं होते| एक और बड़ा सवाल उठाते हुए आईपीएस अधिकारी ने कहा कि उन देश में जब भी पुलिस वाले किसी हत्या की वारदात या बलात्कार की घटनास्थल पर जाते हैं तो वहां स्ट्रोमैटिक डिसऑर्डर की कॉउन्सिलिंग होती है, जब आम जनों में किसी का परिचित या रिश्तेदार जब काल कल्पित हो जाता है तो महीनों तक उस पीढ़ा से नहीं निकल पाते हैं| वहीं देश में एक पुलिसकर्मी सुबह से शाम तक ऐसे तमाम घटनाक्रम देखता है जो उनके दिमाग में घूमते रहते हैं| इन सबके बावजूद पुलिसकर्मी के पास अपने परिवार के लिए भी वक्त नहीं होता है| आईपीएस जैन ने कहा कि यह सारी पीढ़ा एक विचारणीय प्रश्न है क्या हम आंतरिक सुरक्षा की पहली दीवार को कहीं ध्वस्त तो नहीं कर रहे हैं?