दागी अधिकारी को मलाईदार पोस्टिंग पर सियासी उबाल, आखिर मेहरबानी क्यों..?

sanjeev-dubey-transfer-is-become-talking-point-in-politics

भोपाल| मध्य प्रदेश के चर्चित आबकारी अधिकारी के तबादले से राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है| करोड़ो रुपए के घोटाले मामले में सस्पेंड हो चुके इस अधिकारी ने कई कारनामे किये और रसूख के दम पर बहाल भी हो गया| वहीं शिवराज सरकार के दौरान विपक्ष में रहकर कांग्रेस इस अधिकारी की बहाली पर जमकर हल्ला मचाया और सरकार को कटघरे में खड़ा किया था| अब सत्ता में आते ही उसी अधिकारी को इनाम स्वरुप मलाईदार पोस्टिंग भी दे दी| अब सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर कमलनाथ सरकार एक दागी अफसर पर इतना मेहरबान क्यों हैं| 

दरअसल,  देवास जिले में पदस्थ सहायक आबकारी आयुक्त संजीव दुबे का तबादला सबसे कमाई वाले जिले धार में कर दिया गया है| खबर है कि पिछले कई दिनों से एक शराब माफिया दुबे की पोस्टिंग धार कराने के लिए सक्रिय रहा है और नई सरकार का कामकाज शुरू होते ही आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादलों के दौर में इस अधिकारी का भी तबादला कर दिया गया| राजनीतिक गलियारे में इस तबादले की चर्चा जोरो पर है| सवाल खड़ा हो रहा है कि एक दागी अधिकारी को ऐसे जिले में अनानं फानन में क्यों पोस्टिंग दी गई, जबकि यह अधिकारी पूर्व में तीन साल तक जिले में पदस्थ रह चुका है और यहाँ कई घोटालों में भी नाम सामने आया है| चर्चा है कि इस तबादले के पीछे कई लोगों का हित जुड़ा हुआ है, धार में पोस्टिंग के कई मतलब है| क्यूंकि प्रदेश के अधिकाँश शराब माफियाओं की अवैध शराब धार, झाबुआ और आलीराजपुर जिलों से होकर गुजरात में भेजी जाती है और गुजरात भेजी जाने वाली शराब में डिस्टिलर्स से लेकर लाइसेंसी ठेकेदार, ब्लेकर, आबकारी अधिकारी और नेताओं का बड़ा हिस्सा होता है| यह क्षेत्र घोटालेबाजों के लिए चांदी वाला गढ़ है|   हालाँकि धार जिले में आबकारी विभाग के सहायक आयुक्त के पद पर पदस्थ पराक्रम सिंह चंद्रावत के लोकायुक्त मामले में कार्रवाई के बाद धार में विक्रमदीप सांगर को बतौर सहायक आयुक्त पदस्थ किया गया था| सांगर ने आते ही जिले में अवैध शराब माफियाओं और ब्लेकरों की नींद हराम कर दी थी और विधानसभा चुनाव में अवैध शराब के विरुद्ध कार्रवाई में धार जिला प्रथम स्थान पर पहुँच गया था| लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद जिले में कोई परिवर्तन तो नहीं हुआ लेकिन शनिवार को जारी हुए तबादला आदेश ने सबको चौका दिया| इस आदेश के बाद सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस की काफी आलोचना हुई है| क्यूंकि पूर्व की भाजपा सरकार के दौरान नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इस मामले पर सरकार को जमकर कौसा था| और इंदौर के 42 करोड़ के आबकारी घोटाले में दुबे के नाम आने पर निलंबित करने के बाद बहाली पर सवाल उठाये थे| यहां तक कि सीएम हाउस जाकर लिखित शिकायत वहा लगी शिकायत पेटी में डालकर आये थे| सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि एक दागी अधिकारी पर कार्रवाई की जगह मलाईदार पोस्टिंग कर इनाम देना पड़ा| 


कौन है संजीव दुबे 

संजीव दुबे वही अधिकारी है जिस पर इंदौर में शराब माफियाओं के साथ गठजोड़ कर सरकार को 42 करोङ रुपए के राजस्व का नुकसान पहुंचाने का आरोप है | इस मामले में दिलचस्प पहलू यह है कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अभी तक बाइस करोड रुपए की रिकवरी नहीं हो पाई है। इस मामले में संजीव दुबे सहित कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था लेकिन भाजपा सरकार में रसूख के चलते संजीव ने न केवल अपनी बहाली करा ली बल्कि देवास जैसे जिले में पदस्थापना तक करा डाली जबकि शासकीय नियमों में साफ उल्लेख है कि गंभीर विभागीय जांच के चलते किसी भी अधिकारी को मैदानी पदस्थापना नहीं दी जा सकती। ऐसा नहीं कि संजीव के खिलाफ यह पहला मामला हो ।पहले भी कई मामलों में संजीव आरोपों के घेरे में है और विदिशा, रतलाम व धार जिलों में रहते हुए शासकीय राजस्व को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुंचाया है। लेकिन भाजपा नेताओं से नजदीकी के चलते संजीव का बाल बांका भी ना हुआ। 2004 में विदिशा जिले में फंसे हुए संजीव ने कई शराब दुकानदारों से बिना लाइसेंस फीस जमा कराएं उन्हें दुकानें आवंटित कर दी थी जिसके चलते सरकार को लगभग पैसठ लाख रू के राजस्व का नुकसान हुआ। इस मामले में संजीव को आरोप पत्र जारी हुआ था। हैरत की बात यह है कि पैसठ लाख की गंभीर आर्थिक क्षति के बाद भी सरकार ने संजीव के रसूख के चलते उसे केवल एक वेतन वृद्धि रोक कर दंडित किया  और बाद में दूसरे आबकारी आयुक्त ने इस सजा को भी माफ कर दिया जबकि इस सजा को माफ करने के अधिकार केवल शासन को थे। रतलाम में पदस्थ रहते हुए ही भी संजीव के ऊपर शासन को 75 लाख रू का नुकसान होने की शिकायत की गई थी जिस पर सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। दरअसल रतलाम ,आलोट और जावरा में ठेकेदारों को पक्ष में राशि जमा न करने के बावजूद भी शराब  प्रदाय कर दी गई थी जो शासकीय नियमों का सरासर उल्लंघन था। लेकिन संजीव के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। इस मामले में अवैध शराब का ट्रक पकड़े जाने पर आरोपियों के खिलाफ सीजेएम न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए इनकी आबकारी अधिकारियों के साथ मिलीभगत की पुष्टि की थी। धार जिले में भी अवैध शराब से भरा ट्रक ठीकरी थाने में पकड़ा गया था लेकिन इस मामले में भी कोई कार्यवाही नहीं हुई थी।  हैरत की बात यह है कि भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ चुनाव लड़कर सत्ता में आई कांग्रेस ने भ्रष्टाचार का जीरो टोलरेंस और स्वच्छ प्रशासन जैसे वादे जनता से किए थे। लेकिन अब संजीव दुबे जैसे अधिकारियों की प्राइम पोस्टिंग दे दी गई, अब सवाल खड़ा होता है कि सीएम कमलनाथ क्या ऐसे भ्रष्टाचार को ख़त्म करेंगे|