हमका माफी दई दे: कोरोना के समय जंगल के पशुओं को क्या आया याद

भोपाल।इन दिनों चारों तरफ कोरोना वायरस की चर्चाएं जोरों पर है।पूरा देश लॉक डाउन है, सभी इंसानों के मन में कई सवाल और डर बना हुआ है ऐसे में पशुओं के मन में क्या चल रहा है।ये एक कविता के माध्यम से वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र शर्मा ने बताने की कोशिश की है।जो कुछ इस तरह से…

हमका माफी दई दे
(करोना के समय जंगल के पशुओं को क्या आया याद)

टहनी से लिपटे बंदर से बेटा बोला, पापा ….
जल्दी उठो देखो अखबार ने क्या है छापा ।

फैल गया है दुनिया मे कोरोना का कहर…
जिसके कारण बंद हो गया हर गांव और हर शहर ।

हर आदमी आज जी रहा मौत के डर में…..
कैद हुए है ऐसे जैसे हमारे फूफा मामा चिड़ियाघर में।

ऐसे में जब हर इंसान बंद हुआ है घर में …
शेरू चाचा को बोलो ना, पिकनिक मनाए शहर में ।

शेर बोला पीकू तेरे आईडिये में है जान …
परदादा कहां रहते थे अब देता तुमको ज्ञान ।

देखकर तो आए अब क्या है शहर का हाल….
अलसुबह हम निकलेंगे राजधानी भोपाल ।

श्यामला हिल्स को देखकर शेरू का गला भर आया….
आंखों में आंसू भर के बच्चों को ये बतलाया।

देखो ये है श्यामला हिल्स था परदादा का आशियाना …
आज बन गया है प्रदेश के मुखिया का ठिकाना ।

पहले यही से चलता था अपने दादा का जंगल राज…
आज यही से चलता है प्रधान सेवक का काम काज ।

यही है बेटा बडा तालाब, परदादा को था इस पर नाज़…..
क्या अधिकारी क्या नेता सबने इस पर भी बनाए आशियाने आज ।

इस जगह से चलती थी पहले हुकूमतें जंगल की ….
वल्लभ भवन ये आज है यहाँ चर्चा कुर्सी के दंगल की ।

परदादा की हुकूमतों में था सबके लिए इंसाफ…..
अब सत्ता के पट्ठों की तूती बाकी सब का पत्ता साफ ।

खदेड़ के हमको खुश हुआ होगा ज़रूर इंसान…..
लेकिन भूला ईश्वर का न्याय होता सबसे महान ।

भगवान से बड़ा समझने की कर दी उसने भूल ….
एक छोटे से कोरोना ने हिला दी उसकी पूरी चूल ।

वक्त को समय रहते देता पूरा सम्मान …
ना आती ये आफत और बना रहता उसका मान ।

जियो और जीने दो यही विश्व का है नारा ….
जो भुला उसको प्रकृति ने ऐसे ही मारा ।

ईश्वर से है यही गुज़ारिश बस मौका दो अब एक बार….
वादा करता हूँ मै खुद से,
बदलूंगा अपना किरदार ।