कर्मचारी संगठनों को संवैधानिक पीठ से 'आरक्षण' की उम्मीद, बिना प्रमोशन हो गए 35 हजार रिटायर

भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण मामले में 2006 में दिए गए अपने फैसले के मामले में कोई भी अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अब मामले को 7 जजों की संवैधानिक बेंच देखेगी। ऐसे में संवैधानिक बेंच अगस्त के पहले हफ्ते में सुनवाई कर सकती है। कोर्ट के इस फैसले से मप्र में आरक्षित एवं अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी संगठनों में उम्मीद जाग गई है। दोनों संगठनों को भरोसा है कि संवैधानिक पीठ का फैसला उनके पक्ष में आएगा। 

मप्र हाईकोर्ट ने दो साल पहले 30 अप्रैल 2016 को पदोन्नति में आरक्षण नियम 2002 को रद्द कर दिया था। साथ ही कोर्ट ने इस नियम के तहत पदोन्नत किए गए कर्मचारियों को रिवर्ट करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले के विरोध में सरकार ने सुप्रीम में गुहार लगाई। इसके बाद से आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचारधीन है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण का मामला संवैधानिक पीठ में सुनने का फैसला किया। इसके बाद से पीठ का गठन नहीं हो पाया था। अब संवैधानिक पीठ पहली बार पदोन्नति में आरक्षण मामले की सुनवाई करने जा रही है। 


मप्र में 35 हजार से ज्यादा बिना पदोन्नति के रिटायर्ड

30 अप्रैल 2016 के उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा पदोन्नति नियम 2002 असंवैधानिक ठहराए जाने और इनके आधार पर गलत पदोन्नत अनुसूचित जाति/ जनजाति के सेवकों को पदोन्नत करने का निर्णय दिया था जिसके विरुद्ध शासन सर्वोच्च न्यायालय गया था एवं प्रकरण में वर्तमान में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश है फलस्वरूप विगत 2 वर्ष से अधिक समय से पदोन्नतियां बाधित हैं, जबकि इस बीच लगभग 35000 ये ज्यादा शासकीय सेवक बिना पदोन्नति का लाभ पाए सेवानिवृत्त हो चुके हैं।


आरक्षण के 100 से ज्यादा मामले लंबित

मप्र, बिहार, त्रिपुरा, महाराष्ट्र और केंद्र शासन के पदोन्नति में आरक्षण के लगभग 100 मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। संविधान पीठ मात्र एक दिन सुनवाई कर यह फैसला देगी की क्या एम नागराज निर्णय सही है या इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यदि ऐसा निर्णय होता है तो 7 जजों की बेंच इस पर निर्णय करेगी अन्यथा सभी मामलों का निपटारा एम नागराज निर्णय के आधार पर ही कर दिया जावेगा। हाल ही में मई और जून में मान सर्वोच्च न्यायालय की दो अलग अलग युगल पीठ ने अलग अलग अंतरिम आदेश पारित किए थे जिसके आधार पर केंद्र शासन के कार्मिक विभाग ने पदोन्नति करने के निर्देश दिए थे। मप्र में भी इन निदेर्शों के अन्तर्गत सरकार पुराने नियमों के आधार पर ही पदोन्नति का विचार कर रही है, जो कानूनसम्मत नहीं है।


मप्र में पहले से नियम है, इसलिए फैसला पक्ष में आएगा:अजाक्स

अजाक्स के प्रवक्ता विजय शंकर श्रवण ने बताया कि मप्र में पदोन्नति में आरक्षण नियम 2002 के  तहत ही पदोन्नति में आरक्षण दिया गया था। मप्र सरकार ने हमारे पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में तमाम दलीलें दी हैं, जिन्हें पीठ ने स्वीकार किया है। उप्र में न कोई नियम था, न ही कोई डाटा था। मप्र में नियम बना हुआ है, साथ ही मप्र सरकार ने तमाम डाटा भी दिया। अजाक्स को उम्मीर है कि सौ फीसदी फैसला उनके पक्ष में आएगा। मप्र सरकार नया नियम बनाने के लिए स्वतंत्र है। इसका ड्राफ्ट भी लगभग तैयार है। हमारा किसी से कोई विरोधावास नहीं है। पीठ का फैसला अजाक्स के पक्ष में ही आएगा। 


बेटों की उम्र के लोग साहब हो गए हैं: सपाक्स

सपाक्के प्रदेश अध्यक्ष डॉ केदार सिंह तोमर ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण नियम 2002 के तहत सपाक्स वर्ग के अधिकारी कर्मचारियों का जमकर शोषण हुआ है। बेटों की उम्र के लोग साहब हो गए हैं। यह कहां कहा न्याय है। हमें सिर्फ पीठ से ही उम्मीद हैं। सभी सरकारें और राजनीतिक दल हमारे खिलाफ हैं। हम स्वतंत्रता संग्राम की दूसरी लड़ाई लड़ रहे हैं। सपाक्स को उम्मीद है कि पीठ नागराज के फैसले को बरकरार रखेगी। इसके बाद जो लोग रिवर्ट नहीं हुए हैं, वे रिवर्ट होंगे और फिर हम लोग प्रमोट होंगे। सिस्टम में अच्छा नहीं लगता है कि बेंटो की उम्र और कम अंक वाले लोग हमारे साहब हो गए हैं। यह लड़ाई बहुत कठिन है, लेकिन सपाक्स ही जीतेगा।