प्रमोशन में आरक्षण : 3 अगस्त को संवैधानिक पीठ करेगी मामले की सुनवाई

भोपाल। उच्चतम न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति श्रेणियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण पर 2006 के अपने पूर्व के आदेश के खिलाफ अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अब मामले को 7 जजों की संवैधानिक बेंच देखेगी। संवैधानिक बेंच में पहले से कई मामले लिस्टेड हैं, ऐसे में संवैधानिक बेंच अगस्त के पहले हफ्ते में सुनवाई करेगी। केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल ने कहा कि सात जजों की संवैधानिक बेंच मामले की जल्द सुनवाई करे। संवैधानिक पीठ देखेगी कि 2006 के सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के फैसले पर दोबारा विचार की जरूरत है या नहीं।  बुधवार को जरनैल सिंह एवं 52 अन्य संलग्न मामलों की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह फैसला लिया है मामले की सुनवाई  3 अगस्त को होगी| 

संविधान पीठ मप्र, बिहार, त्रिपुरा, महाराष्ट्र और केंद्र सरकार सहित अन्य करीब सौ प्रकरणों में एक साथ सुनवाई करेगी। पीठ एक ही दिन सुनवाई कर यह फैसला देगी कि एम. नागराज मामले में वर्ष 2006 में आया फैसला सही है या इस पर पुनर्विचार की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल पेश हुए और कहा कि इस मामले को जल्दी सुना जाना चाहिए और सात जजों की बेंच जल्द सुनवाई करे, क्योंकि रेलवे और अन्य सरकारी सेवाओं में लाखों लोग जो नौकरी में हैं वह प्रभावित हैं। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के कारण काफी कंफ्यूजन है। चीफ जस्टिस की बेंच ने कहा कि इस मामले को संवैधानिक बेंच देखेगी।

उल्लेखनीय है कि मप्र, बिहार, त्रिपुरा, महाराष्ट्र और केंद्र शासन के पदोन्नति में आरक्षण के लगभग 100 मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। संविधान पीठ मात्र एक दिन सुनवाई कर यह फैसला देगी की क्या एम नागराज निर्णय सही है या इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यदि ऐसा निर्णय होता है तो 7 जजों की बेंच इस पर निर्णय करेगी अन्यथा सभी मामलों का निपटारा एम नागराज निर्णय के आधार पर ही कर दिया जावेगा। हाल ही में मई और जून में मान सर्वोच्च न्यायालय की दो अलग अलग युगल पीठ ने अलग अलग अंतरिम आदेश पारित किए थे जिसके आधार पर केंद्र शासन के कार्मिक विभाग ने पदोन्नति करने के निर्देश दिए थे। म.प्र. में भी इन निदेर्शों के अन्तर्गत सरकार पुराने नियमों के आधार पर ही पदोन्नति का विचार कर रही है, जो कानूनसम्मत नहीं है।

30 अप्रैल 2016 के उच्च न्यायालय जबलपुर द्वारा पदोन्नति नियम 2002 असंवैधानिक ठहराए जाने और इनके आधार पर गलत पदोन्नत अनुसूचित जाति/ जनजाति के सेवकों को पदावनत करने का निर्णय दिया था जिसके विरुद्ध शासन सर्वोच्च न्यायालय गया था एवं प्रकरण में वर्तमान में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश है फलस्वरूप विगत 2 वर्ष से अधिक समय से पदोन्नतियां बाधित हैं, जबकि इस बीच लगभग 50000 शासकीय सेवक बिना पदोन्नति का लाभ पाए सेवानिवृत्त हो चुके हैं।