समाज के बारे में सोचे बिना अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना ही है सही मार्ग, पढ़ें Gita Updesh

आज के आर्टिकल में हम आपको गीता उपदेश में बताई गई कुछ बातों को बताएंगे, जिन्हें अपनाकर आप भी मोक्ष की प्राप्ती कर सकते हैं। आइए जानते हैं विस्तार से...

Sanjucta Pandit
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Gita Updesh : हम सभी बचपन से ही श्रीमद्भगवद्गीता के बारे में सुनते आ रहे हैं जोकि महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। बता दें कि इसमें कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक है, जिसे संस्कृत भाषा में लिखा गया था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर महाभारत का युद्ध लड़ा गया था। यह धर्म और अधर्म की लड़ाई थी, जहां दो परिवार के लोग आमने-सामने थे। वह अपनों के खिलाफ शस्त्र नहीं उठाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से युद्ध न करने की सलाह मांगी। तब भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान देते हुए उन्हें संपूर्ण जीवन का रहस्य बताया। साथ ही विश्व रूप प्रकट कर उनके मन में चल रही दुविधाओं को खत्म किया। भगवान श्री कृष्ण ने यह बताया कि एक क्षत्रिय का यह धर्म है कि वह अपने राज्य में होने वाली अनैतिकता को खत्म करें और अपनी प्रजा को अच्छा और स्वस्थ्य राज्य प्रदान करें। तो चलिए आज के आर्टिकल में हम आपको गीता उपदेश में बताई गई कुछ बातों को बताएंगे, जिन्हें अपनाकर आप भी मोक्ष की प्राप्ती कर सकते हैं। आइए जानते हैं विस्तार से…

समाज के बारे में सोचे बिना अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना ही है सही मार्ग, पढ़ें Gita Updesh

पढ़ें Gita Updesh

गीता के उपदेश के अनुसार, जीवन में सफलता प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

इस श्लोक का अर्थ है कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम्हारे कर्मों का फल तुम्हारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए। गीता के उपदेश के अनुसार, हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए बिना यह सोचे कि उसका परिणाम क्या होगा। अगर हम सच्चे मन से और सही तरीके से अपने कार्यों को करते हैं, तो समाज में मान-सम्मान मिलता है। जब हम अपने कर्तव्यों को सही ढंग से और निष्ठा के साथ निभाते हैं, तो सफलता अपने आप मिल जाती है।

जीवन एक इम्तिहान है

गीता के अनुसार, हम सभी आत्माएं हैं और यह जीवन एक इम्तिहान है।

न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

इस श्लोक का अर्थ है कि आत्मा का कभी जन्म नहीं होता और न ही वह कभी मरती है। वह न तो उत्पन्न हुई है और न उत्पन्न होगी। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती।

(Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। MP Breaking News किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।)


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Sanjucta Pandit

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मैं संयुक्ता पंडित वर्ष 2022 से MP Breaking में बतौर सीनियर कंटेंट राइटर काम कर रही हूँ। डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन और बीए की पढ़ाई करने के बाद से ही मुझे पत्रकार बनना था। जिसके लिए मैं लगातार मध्य प्रदेश की ऑनलाइन वेब साइट्स लाइव इंडिया, VIP News Channel, Khabar Bharat में काम किया है। पत्रकारिता लोकतंत्र का अघोषित चौथा स्तंभ माना जाता है। जिसका मुख्य काम है लोगों की बात को सरकार तक पहुंचाना। इसलिए मैं पिछले 5 सालों से इस क्षेत्र में कार्य कर रही हुं।

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