देश के खाद्यान्न व्यापारियों में बेहद रोष एवं आक्रोश, जानें क्या है पूरा मामला

प्री-पैक्ड एवं प्री-लेबल खाद्यान्न को जीएसटी कर लगाने से छोटे व्यापारियों को होगा नुकसान

नई दिल्ली,डेस्क रिपोर्ट। प्री-पैक्ड (पैक किए गए) (pre-packed) और लेबल वाले खाद्य पदार्थों एवं कुछ अन्य वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाने की सिफारिश पर देश के खाद्यान्न व्यापारियों में बेहद रोष एवं आक्रोश है,और कॉउन्सिल के इस कदम को छोटे निर्माताओं एवं व्यापारियों के हितों के खिलाफ करार दिया गया, जिससे आम सामान की कीमत पर बड़े ब्रांड का कारोबार बढ़ेगा।

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बता दें कि अब तक ब्रांडेड नहीं होने पर विशेष खाद्य पदार्थों, अनाज आदि को जीएसटी से छूट दी गई थी। मगर कॉउन्सिल के इस निर्णय से प्री-पैक, प्री-लेबल दही, लस्सी और बटर मिल्क सहित प्री-पैकेज्ड और प्री-लेबल रिटेल पैक पर भी अब जीएसटी कर लगेगा, और देश भर में 6500 से अधिक अनाज मंडियों में खाद्यान्न व्यापारियों के व्यापार में बड़ा अवरोध आएगा। इस मामले में अनाज व्यापारी संघ वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन एवं केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष विवेक जौहरी से मिलेंगे और इस निर्णय पर पुन: विचार किए जाने का आग्रह भी करेंगे।

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कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी सी भरतिया एवं राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने आज नई दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहा की आज से शुरू हुए सप्ताह में इस मुद्दे पर देश के सभी राज्यों के वित्तमंत्रियों को उनके राज्य के खाद्यान एवं अन्य वस्तुओं के व्यापारी एक ज्ञापन देकर इस निर्णय को वापिस लेने की मांग करेंगे। संवाददाता सम्मेलन में दिल्ली ग्रेन मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेश गुप्ता एवं दाल मिलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप जिंदल ने बताया की इस संबंध में देश भर के अनाज व्यापार संगठनों से लगातार संपर्क किया जा रहा है और सभी संगठन इस निर्णय से बेहद आक्रोशित है। सभी राज्यों में राज्य स्तर के खाद्यान तथा अन्य वस्तुओं के व्यापारियों का सम्मेलन भी इसी सप्ताह उनके अपने राज्यों में होगा तथा इसके बाद दिल्ली में एक राष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित किया जाएगा जिसमें खाद्यान्न से जुड़े देश भर के व्यापारी नेता भाग लेंगे।

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कैट अध्यक्ष भरतिया एवं महामंत्री खंडेलवाल ने कहा की निश्चित रूप से जीएसटी कर संग्रह में वृद्धि होनी चाहिए, किन्तु आम लोगों की वस्तुओं को कर स्लैब में लाने के बजाय कर का दायरा बड़ा करना चाहिए। जिसके लिए जो लोग अभी तक कर दायरे में नहीं आये हैं, उनको कर दायरे में लाया जाए जिससे केंद्र एवं राज्य सरकारों का राजस्व बढ़ेगा। उन्होंने कहा की आजादी से अब तक खाद्यान्न पर कभी भी कर नहीं था किन्तु पहली बार बड़े ब्रांड वाले खाद्यान्न को कर दायरे में लाया गया। उन्होंने कहा की सरकार की मंशा आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को कर से बाहर रख उनके दाम सदैव कम रखने की रही है। क्या वजह थी की 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने क्यों इन जरूरी वस्तुओं को कर से बाहर रखा और अब ऐसा क्या हो गया जिससे इन बुनियादी वस्तुओं पर कर लगाना पड़ा।

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कैट अध्यक्ष भरतिया एवं महामंत्री खंडेलवाल ने इन वस्तुओं को 5% कर दायरे में रखने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा की देश में सभी बड़े ब्रांड की कंपनियां देश की आबादी के केवल 15 प्रतिशत जिसमें उच्चतम वर्ग, उच्च वर्ग एवं उच्च मध्य वर्ग के लोगों की ही जरूरतों की पूर्ती करते हैं जबकि बड़े स्तर पर देश के सभी राज्यों में छोटे निर्माता जिनका अपना लोकल लेबल ही होता है देश की 85 प्रतिशत आबादी की मांग को पूरा करते हैं ! ऐसे में इन वस्तुओं के जीएसटी कर दायरे में आने से जहाँ छोटे निर्माताओं एवं व्यापारियों पर कर पालन का बोझ बढ़ेगा वहीँ आम लोगों को मिलने वाली बुनियादी वस्तुएं भी महंगी हो जाएंगी।

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इस निर्णय के अनुसार अब यदि कोई किराना दुकानदार भी खाद्य पदार्थ अपनी वस्तु की केवल पहचान के लिए ही किसी मार्का के साथ पैक करके बेचता है तो उसे उस खाद्य पदार्थ पर जीएसटी चुकाना पड़ेगा। इस निर्णय के बाद प्री-पैकेज्ड लेबल वाले कृषि उत्पादों जैसे पनीर, छाछ, पैकेज्ड दही, गेहूं का आटा, अन्य अनाज, शहद, पापड़, खाद्यान्न, मांस और मछली (फ्रोजन को छोड़कर), मुरमुरे और गुड़ आदि भी महंगे हो जाएंगे जबकि इन वस्तुओं का उपयोग देश का आम आदमी करता है।